Basic & CCC Notes in Hindi
1: Introduction to Computer in Hindi – कम्प्यूटर का परिचय
“Computer” शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा मे वर्णित ‘Compute’ शब्द से हुई है जिसका आविष्कार गणना करने के लिए किया गया था। इसलिए हम इसे “संगणक” भी कह्ते हैं, पुराने समय में लोग कंप्यूटर का इस्तेमाल केवल गणनाएं करने के लिए करते थें । किन्तु आज़ के समय में कंप्यूटर का इस्तेमाल गेम्स खलेने , म्यूजिक सुनने , वीडियो देखने , प्रेजेंटेशन तैयार करने में , डॉक्यूमेंट बनाने मे , E-mail भेजने और फिल्मो को देखने तथा अलग-अलग तरह के संस्थानों में अलग-अलग तरह के अधिक से अधिक कार्यों को करने के लिए करते है।
कंप्यूटर को दो पार्ट्स मे divide किया गया है।
- कम्प्यूटर हार्डवेयर
- कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर
2: What is Computer System – कंप्यूटर सिस्टम क्या है?
कंप्यूटर एक इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस है, जो user के द्वारा दिए गए instructions (commands) को process करके उसे useful information में convert करता है जिसको output कहते है। कम्प्यूटर सिस्टम , उच्च संग्रह क्षमता (High Storage Capacity), गति (Speed), शुद्धता (Accuracy), विश्वसनीयता (Reliability), एवम् याद रखने की शक्ति के कारण हमारे life के हर क्षेत्र में important हो रहा है| Computer के द्वारा कम समय में अधिक तेजी से calculations की जा सकती है|
3: Full-Form of Computer – कंप्यूटर की फुल फॉर्म
- C – Commonly
- O – Operated
- M – Machine
- P – Particularly
- U – Used
- T – Technical
- E – Educational
- R – Research
|| Introduction to Computer in Hindi | Introduction to Computer in Hindi ||
4: Components of Computer System – कम्प्यूटर सिस्टम के कंपोनेंट्स ?
कंप्यूटर सिस्टम के विभिन्न कंपोनेंट्स निम्न प्रकार से हैं –
- Input Device
- CPU – Central Processing Unit
- Output Device

4.1: Input Device
कम्प्यूटर सिस्टम के अंतर्गत Input Device उन डिवाइसेस को कहा जाता है जिनके द्वारा user , डाटा अथवा निर्देशों को computer में इनपुट कर सकता है| Input Device, Computer तथा user के बीच संपर्क की सुविधा प्रदान करते हैं| इनपुट डाटा उस डेटा को कह्ते है जिसको processor के द्वारा process करके output में convert किया जाता है| Input Device कई रूप में उपलब्ध जिसमें यूज़र keyboard और mouse को सबसे ज्यादा प्रयोग करता है |
There are many types of Input Device – इनपुट डिवाइस के प्रकार
- Keyboard
- Mouse
- Trackball
- Joystick
- Touch screen
- Light pen
- Scanner
- Digitizer Tablet
- Barcode Reader
- Digital Camera
- OMR (Optical Mark Recognition)
- OCR (Optical Character Recognition)
- MICR (Magnetic Ink Character Recognition)
4.2: Output Device
आउटपुट डिवाइस उन डिवाइस को कह्ते हैं जहां पर Processor के द्वारा प्रोसेस किए गए डेटा को आउटपुट के रूप में प्राप्त करते है| यह output हम
मॉनिटर के द्वारा या फिर प्रिंटर के द्वारा निकाली गयी hard copy के रूप मे देख सकते है।
There are many types Of Output Device – आउटपुट डिवाइस के प्रकार–
- Printer – प्रिंटर
- Speakers – स्पीकर
- Monitors – मॉनिटर
- Projector – प्रोजेक्तोर
- Plotter – प्लोटर
- Visual Display Unit- विसुअल डिस्प्ले यूनिट
- Head Phone – हेड फोन
|| Introduction to Computer in Hindi, Introduction to Computer in Hindi |
4.3: CPU – Central Processing Unit
CPU का पूरा नाम Central Processing Unit हैं इसको कंप्यूटर का दिमाग (brain) भी कहते हैं| CPU, यूजर के द्वारा दिए गए Input डाटा को प्रोसेस करके उसको इंफॉर्मेशन में convert करने का कार्य करता है, इसलिये इसको कंप्यूटर का सबसे महत्वपूर्ण भाग कहा जाता है, इसके अतिरिक्त CPU कंप्यूटर से जुड़े हुए हर एक डिवाइस को नियंत्रित करना|
सीपीयू (CPU) तीन भागों में बटा हुआ होता है:-
- ALU (Arithmetic Logic Unit)
- MU (Memory Unit)
- CU (Control Unit)
ALU – Arithmetic Logic Unit
ALU (अर्थमेटिक लॉजिक यूनिट), यह कंप्यूटर हार्डवेयर के अंतर्गत एक डिजिटल सर्किट के जैसा होता है, ALU को Basic Arithmetic Operation के लिए use किया जाता है अर्थमेटिक लॉजिक यूनिट (ALU) का मुख्य काम अंकगणितीय गणना करना होता है अंकगणितीय गणना जैसे जोड़ना घटाना गुणा करना भाग करना और गणित की तरह और भी कार्य करना आदी | इसके अतिरिक्त तर्क संबंधित काम जितने भी होते हैं जैसे तुलना करना, चयन करना, मिलान करना, डाटा को आपस में merge करने का आदि |
CU – Control Unit
CU का पूरा नाम कंट्रोल यूनिट(Control Unit) है यह CPU (Central Processing Unit) का एक महत्वपूर्ण भाग होता है जो कम्प्यूटर के components की गतिविधियों के बीच सामंजस्य स्थापित करता है। यह CPU से जुड़े हुए विभिन्न प्रकार के डिवाइसेज को control करता है जैसे इनपुट डिवाइस , आउटपुट डिवाइस तथा ALU, यह मेमोरी के बीच data तथा information का आदान-प्रदान को भी control करता है |
Memory
Memory unit का मुख्य कार्य data तथा information को स्टोर करना होता है | Memory में स्टोर किए गए data को भविष्य में जरूरत पड़ने पर कंप्यूटर द्वारा read किया जा सकता है |
मेमोरी को दो भागो मे बाटा गया है़ :-
- प्राइमरी मेमोरी (Primary Memory)
- सेकेंडरी मेमोरी (Secondary Memory)
Chapter-2 : History of Computer in Hindi – कंप्यूटर का इतिहास
History of Computer in Hindi
History of Computer in Hindi :- आधुनिक युग मे , हम सब जानते है कि कम्प्यूटर का प्रयोग मानव के लिये कितना जरूरी हो गया है इस मानव निर्मित यंत्र ( कम्प्यूटर ) ने हमारे जीवन मे काम करने के तरीके को पूरी तरह से बदल दिया है। Computer शब्द जिसकी उत्पत्ति “कम्प्यूट” शब्द से हुई है, जिसका इतिहास हजारो वर्ष पुराना है, पुराने समय मे लोगो के लिये किसी भी प्रकार की गणना करना सरल नहीं था । लोग गणना करने के लिये तरह तरह के method अपनाते थे जैसे कि लकड़ियों का सहारा लेना आदी । लेकिन आज के समय मे ये सब कम्प्यूटर द्वारा बहुत ही आसान हो गया है|
गणना करने के लिए सबसे पह्ले अबेकस नाम के यंत्र की खोज हुई थीं कुछ यंत्र है जिनका हमने नीचे परिचय दिया है:-
Invention of Abacus – (अबेकस का अविष्कार)
Abacus का इतिहास हजारो वर्षों पुराना है जिसको चीन मे 16वीं शताब्दी के दौरान खोजा गया था इसका आविष्कार “ली काई चेन” ने किया था । Abacus मे एक लकड़ी का फ्रेम होता था जो कि एक आयताकार रूप मे होता था इस फ्रेम मे तारों की मदद से मोतियो को पिरोया जाता था | जितनी भी गणनाये होती थी सब इसी के माध्यम से की जाती थी | हर मोति का मान 1 होता था जिसको जोड़ना और घटाने के लिये इस्तेमाल किया जाता था 1
Invention of Napier Bones – (नेपियर बोन्स का अविष्कार)
यह आविष्कार सन 1617 मे हुआ था जिसको Napier Bones के नाम से जाना जाता है इसको स्कॉटलैंड के एक वैज्ञानिक ने जिसका नाम जॉन नेपियर था ,ने इसको विकसित किया था । इस मशीन की सहायता से गणना करने का कार्य बहुत ते़जी से होता है । इस मशीन के अंतर्गत जोड़ना , घटाना , गुणा करना , भाग करना ये सभी कार्य ते़जी के साथ किये जा सकते है|
Invention of Pascal Calculator – (पास्कल यंत्र का अविष्कार)
इस यंत्र का आविष्कार ब्लेज़ पास्कल नाम के व्यक्ति ने सन् 1962 मे किया था यह व्यक्ति France का रह्ने वाला था इसने “पास्कलिन” नाम की मशीन की गणना की थी इस यंत्र का प्रयोग भी जोड़ना , घटाना , गुणा करना , भाग करना आदि सभी कार्यो के लिये किया जाता है इस यंत्र को हम Pascal Calculator के नाम से जानते है |
Invention of Mechanical Calculator (यांत्रिक कैलकुलेटर का अविष्कार)
इस यंत्र का आविष्कार गोटफ्रेड वान लिब्निज नाम के व्यक्ति ने किया था यह व्यक्ति जर्मन का रह्ने वाला था यह एक गणितज्ञ था इस मशीन को हम यांत्रिक कैलकुलेटर के नाम से जानते है इस मशीन की मदद से जोड़ना एवम घटाना के साथ साथ गुणा एवम भाग भी कर सकते है |
Invention of Slide Rules – (स्लाइड रूल यंत्र का अविष्कार)
विलियम आउटरेड जो की जर्मनी के रहने वाले थे , इन्होने ही स्लाइड रूल यंत्र का अविष्कार किया था इस यंत्र के अंतर्गत लघुगणक विधि के आधार पर आसानी से गणनाए की जा सकती थी | इस यंत्र का प्रयोग Square root निकालने , Logarithm एवं Trigonometric Functions जैसी गणनाओ के लिए किया जाता था ।
Invention of Difference Engine – (डिफरेंस इंजन का अविष्कार)
इस यंत्र का आविष्कार ब्रिटिश मे रह्ने वाले एक व्यक्ति ने किया था जिनका नाम चार्ल्स बेबेज था ये कैंब्रिज विश्विद्यालय मे गणित के प्रोफेसर थे इन्हे आधुनिक कम्प्यूटर का जन्म दाता भी कहा जाता है इन्होने इस यंत्र मे शाफ़्ट एवम गियर का प्रयोग किया था यह यंत्र भाप के द्वारा चलती है इस मशीन की मदद से बीजगणितीय फलनों का मान दशमलव के 20 स्थान तक शुद्धता के साथ ज्ञात किया जा सकता था | इस मशीन का प्रयोग रेल, डाक , तथा व्यावसायिक कार्यो में किया जाता था| || History of Computer
Invention of Analytical Engine – (एनालिटिकल इंजन का अविष्कार)
चार्ल्स बेबेज ने जब डिफरेंस इंजन के आविष्कार मे सफलता प्राप्त की तो उन्होने इसी तरह के यंत्र को और भी ज्यादा एडवांस बनाने के लिये एक रूप रेखा तैयार जो कि आज के समय मे इस्तेमाल हो रहे कोम्पुटरों से काफ़ी मिलती है | इस यंत्र को पाँच भागो मे बाँटा गया है जैसे कि इनपुट एवम आउटपुट इकाई , स्टोर एवम कंट्रोल तथ मिल | इस यंत्र मे अंक गणितीय गणनाओ को करने की क्षमता के साथ साथ output को store भी किया जा सकता था |
Chapter-3 : Generations of Computer in Hindi – कम्प्यूटर की पीढ़ियां
Generations of Computer in Hindi – कंप्यूटर की पीढियां
आज के समय मे Computer के विकास में बहुत तेजी से बदलाव आया । लेकिन अगर देखा जाये तो Computer का विकास 16 वीं शताब्दी से ही शुरू हो गया था। प्रत्येक generation के बाद, Computer के आकार-प्रकार, कार्यप्रणाली और कार्यशीलता में बहुत ते़जी से सुधार हुआ है।
आज के समय मे कंप्यूटर काफी modern है। इस अवधि के दौरान, कंप्यूटर में काफी changes आए हैं। जिसने कंप्यूटरों की नई तरह की generation को जन्म दिया है और different types के computers का आविष्कार हुआ है। जिसको Generations of Computer के नाम से भी जाना जाता है।
- प्रथम पीढ़ी के कंप्यूटर (1940 – 1956)
- दितिय पीढ़ी के कंप्यूटर (1956 – 1963)
- तीसरी पीढ़ी के कंप्यूटर (1964 – 1971)
- चौथी पीढ़ी के कंप्यूटर (1971 – 1980)
- पांचवीं पीढ़ी के कंप्यूटर (Present टाइम and Future)
First Generations of Computer (1940 – 1956)
First Generations of Computer in Hindi : – प्रथम पीढ़ी के कंप्यूटर में वैक्यूम ट्यूब ( Vacuum Tube ) का प्रयोग किया गया था। Vacuum Tube एक नाजुक कांच का यंत्र था । इस पीढ़ी के कम्प्यूटर का साइज़ बहुत ही बड़ा होता था तथा अत्यधिक ऊष्मा उत्पन्न होने की वजह से इसको ठंडा रखने के लिए एयर कंडीशन -AC का उपयोग किया जाता था|
इस पीढ़ी के कुछ कंप्यूटरों के नाम इस प्रकार हैं:- ENIAC, EDVAC, IBM-701, IBM-650, UNIVAC-1, UNIVAC-2, | प्रथम इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर (Electronic Computer) का नाम , “ENIAC” (इलेक्ट्रौनिक न्यूमेरिकल इंटीग्रेटर एंड कंप्यूटर) था। इसका आविष्कार J. Presper Eckert और John William Mauchly ने Pennsylvania University में किया था।
इनकी computers की कार्य करने की गति बहुत धीमी होती थी तथा इनका मूल्य भी बहुत अधिक होता था| इस पीढ़ी के कंप्यूटर में Operating System का use नहीं किया जाता था जिसके कारण से बहुत से कार्य अपने आप ही करने पड़ते थे
ENIAC Computer लगभग 30 से 50 फीट लंबा था, जिसका weight 30 टन था, इस पीढ़ी के कंप्यूटर में information को स्टोर करने के लिए magnetic ड्रम और magnetic कोर का use किया जाता था।
Second Generations of Computer (1956 to 1963)
Second Generations of Computer in Hindi : – दितिय पीढ़ी के कंप्यूटर में Vacuum Tube की जगह “ट्रांजिस्टर” (Transistor) का प्रयोग किया जाने लगा था| जो वैक्यूम ट्यूब की अपेक्षा size में छोटे होते थे | इस पीढ़ी के कंप्यूटर का विकास William Shockley ने 1947 में किया था। ये कंप्यूटर आकार में छोटे होने के साथ साथ , तेज और सस्ते भी हो गए थे।
यह कम ऊष्मा उत्पन्न करते थे लेकिन फिर भी इन को ठंडा रखने के लिए एयर कंडीशन- AC की जरूरत पड़ती थी| इन कंप्यूटरों पर Programming करना संभव था इस पीढ़ी के कंप्यूटर का उपयोग मुख्य रूप से न्यूक्लियर पावर प्लांट में किया गया था।
इस पीढ़ी के कंप्यूटर में प्राइमरी मेमोरी की जगह मैग्नेटिक कोर का इस्तेमाल किया जाता था तथा सेकेंडरी मेमोरी की जगह मैग्नेटिक टेप का use किया जाता था| इस पीढ़ी के कम्प्यूटर में High Level Programming Language का विकास हुआ जैसे FOTRAN, COBOL और ALGOL |
Third Generations of Computer (1964 to 1971)
Third Generations of Computer in Hindi : – तीसरी पीढ़ी के अंतर्गत कंप्यूटरों में ट्रांजिस्टर के स्थान पर इंटीग्रेटेड सर्किट (integrated Circuit) का इस्तेमाल किया गया था।, जिनको सिलिकॉन चिप भी कहा जाता हैं| इस पीढ़ी मे, IC chip का आकार बहुत छोटा होता था तथा इसमें बहुत सारे ट्रांजिस्टर होते थे। और एक चिप मे सैकड़ों ट्रांजिस्टर होने के कारण इनमें अधिक कार्य करने की कार्यक्षमता थी |
एक ही समय में इन कंप्यूटरों पर कई अलग-अलग कार्य किये जा सकते थे | आईसी चिप – IC से बने कंप्यूटर आकार में छोटे तथा तीव्र गति वाले होते थे| आईसी (IC) का आविष्कार Texas Instruments Company के एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर Jack Kilby द्वारा 12 सितंबर 1958 में किया गया था।
इस पीढ़ी के मुख्य कंप्यूटर ICL 2903, ICL 1900, UNIVAC 1108 और System 1360 थे। इस पीढ़ी के कंप्यूटरों मे information को स्टोर करने के लिए स्टोरेज डिवाइस का भी विकास हुआ| इसी पीढ़ी से multiprocessing और multiprogramming का भी विकास possible हो गया था|
इस पीढ़ी में Keyboard और Mouse का भी उपयोग होना start हो गया था इसके अतिरिक्त मॉनिटर का भी विकास हुआ और इनका उपयोग शुरु हो चुका था| इसमें ऑपरेटिंग सिस्टम का भी विकास हुआ जिससे कंप्यूटर की कार्य करने की क्षमता काफी ते़ज हो गयी |
Fourth Generations of Computer (1971 to 1980)
Fourth Generations of Computer in Hindi :- चौथी पीढ़ी के कंप्यूटर मे माइक्रोप्रोसेसर – Microprocessor का प्रयोग किया जाने लगा था । आज के समय मे ये कंप्यूटर उपयोग मे लिये जाते हैं और आगे भी विकसित किए जा रहे हैं। इस पीढ़ी के Computer में LSI और VLSI तकनीकी का उपयोग किया जाने लगा |
इस जनरेशन में माइक्रोप्रोसेसर चिप्स (Microprocessor Chips) का विकास किया गया जिस की कार्य करने की क्षमता बहुत अधिक होती है, जिसमें हजारों लाखों ट्रांजिस्टर – transistor के बराबर कार्य करने की क्षमता होती है| Microprocessor का आविष्कार 1971 में Marcian E Huff द्वारा किया गया था।
इस पीढ़ी के कंप्यूटर size में बहुत छोटे होते हैं जो एक normal मेज पर रखे जा सकते हैं| इनमें बिजली की खपत बहुत ही कम होती है तथा इनको ठंडा रखने के लिए एयर कंडीशन – AC की आवश्यकता भी नहीं पड़ती| इनका मूल्य कम होने के कारण आम इंसान भी इसका उपयोग कर सकते हैं| इसी पीढ़ी में DOS, MS-Window जैसे ऑपरेटिंग सिस्टम का विकास हुआ जिसके कारण कंप्यूटर की कार्य क्षमता में कई गुना इजाफा हुआ| || Generations of Computer ||
इस पीढ़ी मे माइक्रोप्रोसेसर की तकनीक का use होने के कारण इसको Large Scale Integrated Circuit का नाम दिया गया था। आज के समय मे दो सबसे बड़ी माइक्रोप्रोसेसर (microprocessor) बनाने वाली कंपनिया Intel और AMD है। MS DOS का इस्तेमाल सबसे पहले इसी पीढ़ी में हुआ था। और कुछ समय बाद ही Microsoft Windows Operating System भी कंप्यूटरों में use होने लगा था। जिसकी कारण से Multimedia, C Programming Language का विकास हुआ था।
Fifth Generations of Computer (1980- Present)
इस पीढ़ी के computer , Ultra Large Scale Integration तकनीक पर आधारित है जिस पर अभी भी research चल रही है इस Generation के कंप्यूटर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक – Artificial Intelligence पर ज़ोर दिया जा रहा है जिससे कंप्यूटर की काम करने की क्षमता और बेहतरीन हो जाती है
इस पीढ़ी के कम्प्यूटर में खुद सोचने की क्षमता को पैदा करने की कोशिस की जा रही है। कम्प्यूटर को हर field में कार्य करने के योग्य बनाने की कोसिस की जा रही है। इसके अंतर्गत Graphical User Interface की help से इसे और अधिक आसन बनाया जा रहा है।
Chapter-4 : Characteristics of Computer in Hindi – कंप्यूटर की विशेषताएं
Characteristics of Computer in Hindi – कंप्यूटर की विशेषताएँ
आप सभी जानते है, कि Computer को टेक्नोलॉजी की field में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। Computer की इस टेक्नोलॉजी को हम Laptop और Desktop के नाम से भी जानते हैं कंप्यूटर के गुण और फीचर ही इसको useful बनाते है। इस Article मे हमने Computer की विशेषताओं – Characteristics of Computer in Hindi का उल्लेख किया है।
कंप्यूटर की विशेषताएं निम्न प्रकार से हैं:-
- High speed – उच्च गति
- Accuracy – शुद्धता या सत्यता
- Storage capability – भंडारण क्षमता
- Diligence – कर्मठता या परिश्रम
- Versatility – बहुमुखी प्रतिभा
- Reliability – विश्वसनीयता
- Automation – स्वचालित
- Decision – निर्णय लेने की क्षमता
- Secrecy – गोपनीयता
High speed – उच्च गति
जब हम कोई Calculation करते है तो उसे करने में काफी समय लगा देते हैं लेकिन अगर वही Calculation हम Computer से करते हैं तो क्षण भर मे हो जाती है। इसका मतलब यह है कि Computer सेकंड में लाखों calculations कर सकता है आज के समय मे computer नैनो सेकंड में भी गणनाएं कर सकता है। Computer को गति Processor के द्वारा मिलती है। Computer की गति को Millisecond, Microsecond या Nanosecond में भी माप सकते है।
Accuracy – शुद्धता या सत्यता
Computer मे जितनी भी calculation होती है, कम्प्यूटर उनको सही तरीके से करता है। और वो भी तेज गति के साथ , Computer किसी भी work को करने में कोई mistake नहीं करता है कंप्यूटर hard से hard कार्य का भी बिना किसी गलती के answer निकाल देता है और हमेशा सही answer देता है क्योंकि Computer यूजर द्वारा दिए गए Instructions के अनुसार काम करता है।
Storage capability – भंडारण क्षमता
वर्तमान युग मे Data के कई प्रकार होते है जैसे कि Audio, Video, Text file या कोई अन्य प्रकार की Document Files जिसको Computer में Store करना आवश्यक होता है आज के समय मे Computer कि Storage क्षमता बहुत अधिक होती है। जिसके कारण हम किसी भी प्रकार का Data या Information को अधिक से अधिक मात्रा मे computer मे store करके रख सकते है। एवम इन सभी Data को जरूरत पड़ने पर भविष्य में use भी कर सकते है।
Diligence – कर्मठता या परिश्रम
Computer एक ऐसी मशीन है जो बिना कोई mistake किए हुए महीनों तक continue काम कर सकता है। लंबी समय अवधी तक continue काम करते हुए यह कभी भी थकता नहीं है। वहीं अगर एक, इंसान की बात की जाए तो वह कुछ ही घंटे काम करते हुए थक जाता है लेकिन Computer किसी भी काम को, चाहे वो काम कठिन ही क्यो ना हो वह किसी भी भेदभाव के बिना अपना कार्य करता है.
Versatility – बहुमुखी प्रतिभा
Computer की हेल्प से हम अनेक प्रकार के कार्य कर सकते है Computer अपनी popularity की वजह से पूरे world मे बहुत तीर्व गति से आगे बढ़ रहा है। आज के समय मे कंप्यूटर में हम एक ही समय मे अलग -अलग तरह के कार्य कर सकते है | आज के समय में लगभग हर field में कंप्यूटर का use होने लगा है जैसे- Shop, Mall, Bank, College, Railway, School, Other Business इत्यादि।
Reliability – विश्वसनीयता
Computer के द्वारा किया गया प्रत्येक कार्य reliable होता है। Computer सारे काम को विश्वसनीयता के साथ करता रहता है। Computer किसी भी काम को करते हुए कभी भी थकता नहीं है। सभी लोग इसकी कार्य प्रणाली पर बहुत विश्वास करते हैं।
Automation – स्वचालित
Computer एक ऐसी मशीन है जो कि हर कार्य को Automatic करती हैं Computer मे कार्य करने के लिए हमे उसको instruction देनी पड़ती है। Computer को यह instruction, Software के द्वारा मिलती हैं। Computer से हमे जिस तरह का कार्य लेना होता है उसमे उसी प्रकार का Software डाला जता है।
Decision – निर्णय लेने की क्षमता
जब हम Computer को कोई work करने के लिए देते है तो वह एकदम यह Decide कर लेता है कि उसको क्या कार्य करना है। यह बहुत ते़जी से निर्णय लेता है।
Secrecy – गोपनीयता
कंप्यूटर में हम जितना भी कार्य करते है उसको हम Password का इस्तेमाल करके अपने कम्प्यूटर मे बिल्कुल सुरक्षित रख सकते हैं |
Chapter-5 : Application of Computers in Hindi – कम्प्यूटर के अनुप्रयोग
Application of Computers in Hindi – कम्प्यूटर के अनुप्रयोग
Application of Computers in Hindi || कंप्यूटर एक ऐसी मशीन है जिसका इस्तेमाल हम daily अपने जीवन मे विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये करते है यह कई कठिन कार्यों को बहुत आसानी से solve कर देता है |
कंप्यूटर को निम्न क्षेत्रों में प्रयोग किया जाता हैं- Application of Computers in Hindi
- शिक्षा के क्षेत्र में – In education
- बैंकों में – In banks
- शोध-कार्यों में – In research
- चिकित्सा के क्षेत्र में – in medicine
- प्रशासन – Governance
- वाणिज्य क्षेत्र में – In commerce
- मनोरंजन के क्षेत्र में – In entertainment
- इंटरनेट के क्षेत्र में – in the Internet
- ज्योतिष के क्षेत्र में – In astrology
- यात्रा में – In travel
- डाटा प्रोसेसिंग – Data processing
- संचार के क्षेत्र में – In Communication
- सुरक्षा के क्षेत्र में – Security
- उद्योग के क्षेत्र में – In Industry
शिक्षा के क्षेत्र में – In education
वर्तमान युग इतना तीर्व है कि अगर हमे कोई जानकारी चाहिये होती है तो हम तुरंत कम्प्यूटर की सहायता लेने की पहल कर देते है शिक्षा के क्षेत्र में कंप्यूटर का अपना ही बहुत बड़ा योगदान है | आज के समय में कंप्यूटर का इस्तेमाल हम विभिन्न-विभिन्न शिक्षण संस्थानों जैसे की स्कूल , कॉलेजों और स्मार्ट क्लास मे करने लगे है शिक्षा के क्षेत्र में कम्प्यूटर के द्वारा हम नई-नई खोज करते है
बैंकों में – In banks
आज के वर्तमान युग मे कम्प्यूटर का बैंकों में बहुत ज्यादा प्रयोग हो रहा है| जितना भी पैसो का लेन-देन बैंकों में होता है, वो सब कम्प्यूटर के माध्यम से ही किया जाता है कम्प्यूटर के माध्यम से पैसे निकालना एवम् जमा करना बहुत ही आसानी से हो जाता है कम्प्यूटर मे पैसो के हिसाब-किताब का record कभी भी देखा जा सकता है | इसके अतिरिक्त घर बैठे ही हम सब अपने बैंक A/C की पूरी जानकारी इंटरनेट के द्वारा किसी भी time ले सकते हैं|
शोध-कार्यों में – In research
आधुनिक युग मे कम्प्यूटर के प्रयोग से मौसम विभाग की जानकारी एवम उसकी भविष्यवाणी तथा तरह-तरह की रिसर्च अथवा खोज करने के लिये किया जाता हैं| इसके साथ-साथ मशीनो को design करने जैसे कि Airplane डिजाइन , कार डिजाइन , बिल्डिंग डिजाइन , मिसाइल डिजाइन आदि के लिये किया जाता हैं|
चिकित्सा के क्षेत्र में – in medicine
चिकित्सा के क्षेत्र मे Science ने काफी तरक्की कर ली है जिसमें कम्प्यूटर का बहुत ही बड़ा योगदान है आज कम्प्यूटर के माध्यम से ही मानव शरीर के अंदर तरह- तरह की बीमारियों की खोज करने मे आसानी हो गयी है जितने भी चिकित्सा सम्बंधित परीक्षण है वो सब कम्प्यूटर के माध्यम से ही किये जाते है
प्रशासनिक कार्यो मे – Governance
जितनी भी सरकारी योजनाये है वो सब कम्प्यूटर के माध्यम से आसानी से पूरी की जा रही है चाहे वो जन सेवा योजना हो या समय समय पर सरकार द्वारा प्रदान की जा रही हो|
|| Application of Computers in Hindi || Application of Computers in Hindi ||
वाणिज्य क्षेत्र में – In Commerce
कम्प्यूटर का प्रचलन अब हर क्षेत्र मे जैसे कि बैंक , संस्था , बीमा , सरकारी और प्राइवेट कंपनी , दुकानों आदि मे किया जाने लगा है बिना कम्प्यूटर के इन क्षेत्रो मे कार्य करना आज के समय मे असम्भव सा हो गया है |
मनोरंजन के क्षेत्र में – In entertainment
मनोरंजन के क्षेत्र में कम्प्यूटर ने तो जैसे क्रांति ही ला दी है मल्टीमिडिया के प्रयोग ने तो कम्प्यूटर को बहुयामी बना दिया है, कम्प्यूटर का प्रायः सिनेमा, टेलीविजन, वीडियो गेम खेलने के लिये भी किया जाता है कंप्यूटर मे मनोरंजन के लिए विभिन्न प्रकार की म्यूजिक एवम मूवीज साइट के साथ साथ YouTube का उपयोग किया जाता है ।
इंटरनेट के क्षेत्र में – in the Internet
पुरे World मे इंटरनेट का use सबसे अधिक किया जाता है जिसमें कम्प्यूटर की अहम भूमिका है कम्प्यूटर के द्वारा इंटरनेट का use करके हम तरह तरह की जानकारी हासिल कर सकते हैं। इंटरनेट के द्वारा हम किसी भी विषय से संबंधित information को खोज सकते है इसके अतिरिक्त हम ईमेल के द्वारा document एवम पत्रों को एक कंप्यूटर से दूसरे कम्प्यूटर मे पूरे विश्व मे कही भी भेज सकते है
ज्योतिष के क्षेत्र में – In astrology
कंप्यूटर के द्वारा हम ज्योतिष की गणना बहुत ही आसानी से कर सकते है आज कल ज्यादातर ज्योतिष , जनमपत्रि बनाने के लिए कम्प्यूटर का ही इंस्तेमाल करते है ज्योतिष की गणनाएं कंप्यूटर के माध्यम से कुछ ही क्षणों में की जा सकती है ।
यात्रा में – In travel
आज के समय मे कंप्यूटर का अधिकांश प्रयोग रेलवे मे अधिक से अधिक किया जाता है जैसे की Ticket को book करना Payment करना , Train की वर्तमान स्थिति का पता लगाना इत्यादि , इसके अतिरिक्त एयरलाइन और रोडवेज में भी कंप्यूटर का प्रयोग अधिक से अधिक किया जाता।
डाटा प्रोसेसिंग – Data processing
Computer का use हम बडें स्तर पर Data processing करने के लिये एवम सूचनाओ को सही रूप से तैयार करने के लिये करते है इससे डाटा को store करके रखना एवम उसका विश्लेशण करना बहुत ही आसान हो जाता है ।
संचार के क्षेत्र में – In Communication
कम्प्यूटर के प्रयोग के कारण ही संचार क्षेत्र में क्रांति आयीं है आज इंटरनेट और कम्प्यूटर के माध्यम से ही हम विदेशों मे भी बाते कर सकते है आज के समय मे कम्प्यूटर मे इंटरनेट चलाने के लिये , इंटरनेट की कई सारी तकनीक उपलब्ध है जैसे कि 2G , 3G , 4G । सबसे तेज़ स्पीड आज के समय मे 4G तकनीक की है ।
Chapter-6 : Classification of Computer in Hindi – कम्प्यूटर का वर्गीकरण
1:- Classification of Computer in Hindi- कम्प्यूटर का वर्गीकरण
कंप्यूटर को हम जरूरत के हिसाब से अलग-अलग स्थानों पर उपयोग मे लाते है | इसलिए कंप्यूटर का वर्गीकरण हम उसके द्वारा होने वाले कार्यों के आधार पर ही कर सकते है:-
Computer को हम निम्न प्रकार से वर्गीकृत कर सकते हैं| ( Classification of Computer in Hindi )
- आकार ( Size ) के आधार पर
- कार्य पद्धति ( Mechanism )के आधार पर
- उद्देश्य ( Purpose ) के आधार पर
1.1:- आकार ( Size ) के आधार पर
आकार के आधार पर कम्प्यूटर कों निम्न भागो मे बाँटा गया है-
- माइक्रो कंप्यूटर (Micro Computer)
- मिनी कम्प्यूटर (Mini Computer)
- मेनफ्रेम कम्प्यूटर (Mainframe Computer)
- सुपर कम्प्यूटर (Super Computer)
माइक्रो कंप्यूटर (Micro Computer)
माइक्रो कम्प्यूटर का आविष्कार माइक्रो प्रोसेसर के द्वारा ही सम्भव हो पाया है माइक्रो प्रोसेसर जिसको 1970 मे बनाया गया था इसी के द्वारा ही एक अच्छे कम्प्यूटर का निर्माण हो पाया , ये कम्प्यूटर आकार मे छोटे होते है तथा इनकी लागत भी कम होती है इस प्रकार के कम्प्यूटर को एक Desk पर आराम से रखा जा सकता है ये कम्प्यूटर Personal Computer कह्लाते है माइक्रो कम्प्यूटर कुछ पार्ट्स से मिलकर बना होता है जैसे कि CPU , Keyboard , Mouse , Hardisk आदि |
मिनी कम्प्यूटर (Mini Computer)
मिनी कंप्यूटर , आकर मे माइक्रो कम्प्यूटर के मुकाबले थोड़े बड़े होते है। इन कंप्यूटर की कार्य करने की क्षमता, मिनी कम्प्यूटर की अपेक्षा थोड़ी ज्यादा होती है। तथा इनकी कीमत माइक्रो कंप्यूटर की अपेक्षा ज्यादा होती है। इन कंप्यूटर्स को प्रत्येक इंसान नहीं ख़रीद सकता। इन कंप्यूटर पर कई व्यक्ति एक साथ कार्य को पूरा कर सकते है तथा ये कंप्यूटर्स कोम्पनियो मे प्रयोग में लिये जाते है। यह कंप्यूटर् एक से ज्यादा C.P.U. से मिलकर बना होता है।
मेनफ्रेम कम्प्यूटर (Mainframe Computer)
मेनफ्रेम कंप्यूटर , मिनी कम्प्यूटर की अपेक्षा आकर में बड़े होते है। और इनकी डेटा store करने की क्षमता भी ज्यादा होती है। ये कंप्यूटर पूरा दिन 24 घंटे लगातार काम कर सकते है तथा इन computers पर एक साथ सेकड़ो व्यक्ति काम कर सकते है। ये computers बहुत ही तेज़ गति से कार्य करते है इसलिए इनको बड़ी-बड़ी कंपनियों, सरकरी दफ्तरो एवम बैंको में use किया जाता है।
सुपर कम्प्यूटर (Super Computer)
आज के समय मे सबसे तेज़ कम्प्यूटर ,सुपर कंप्यूटर को कहा जाता है ये कम्प्यूटर काफी ते़ज गति से कार्य करते हैं और एक सेकंड मे अनगिनत गणनाये कर सकते हैं, सुपर कंप्यूटर मे डेटा स्टोर करने की छमता सबसे अधिक होती हैं, सुपर कम्प्यूटर आकार मे सबसे बड़े होते हैं तथा इनका प्रयोग मौसम विभाग की जानकारी प्राप्त करने के लिये किया जाता है, इसके अतिरिक्त सुपर कंप्यूटर का प्रयोग परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष की खोज, आदि के लिये किया जाता है। World का पह्ला सुपर कंप्यूटर 1976 में Cray रिसर्च कंपनी के द्वारा विकसित किया गया था |
1.2:- कार्य पद्धति ( Mechanism )के आधार पर
कार्य पद्धति के आधार पर कम्प्यूटर कों तीन भागो मे बाँटा गया है-
- एनालॉग कंप्यूटर – Analog Computer
- डिजिटल कम्प्यूटर – Digital Computer
- हाइब्रिड कंप्यूटर – Hybrid Computer
एनालॉग कंप्यूटर – Analog Computer
एनालॉग कंप्यूटर उन computers को कह्ते है जो कि भौतिक मात्राओं जैसे कि- तापमान अर्थात Temperature , दाब – Pressure, लम्बाई – Height आदि को मापकर उनके परिणाम अंको में वयक्त कर सकते है। एनालॉग कंप्यूटर इंजीनियरिंग एवम विज्ञान के क्षेत्र में use किये जाते है
डिजिटल कम्प्यूटर – Digital Computer
Digital Computer उन computers को कह्ते है जो कि अंको कि गणना कर सकते है ये कम्प्यूटर बाइनरी नंबर सिस्टम पर कार्य करते है इनका उपयोग बिजनेस को चलाने मे किया जाता है।
हाइब्रिड कंप्यूटर – Hybrid Computer
Hybrid वे कंप्यूटर होते है जिनमे Analog एवम Digital कंप्यूटर दोनों के ही गुण शामिल हो हाइब्रिड कंप्यूटर कहलाते है। इन computers के द्वारा भौतिक मात्राओं को अंको में change करके उनको digital रूप में बदलने का कार्य किया जाता है|
1.3:- उद्देश्य ( Purpose ) के आधार पर
उद्देश्य के आधार पर कम्प्यूटर कों तीन भागो मे बाँटा गया है-
- सामान्य-उद्देशीय कम्प्युटर – General Purpose Computer
- विशिष्ट-उद्देशीय कम्प्युटर – Special Purpose Computer
सामान्य-उद्देशीय कम्प्युटर – General Purpose Computer
ऐसे कम्प्यूटर जो अनेक प्रकार के काम को करने की क्षमता रखते है जैसे कि ऑफिस से सम्बंधित Word documentation को तैयार करने का काम, Database से सम्बंधित काम आदि , उन computers को सामान्य-उद्देशीय कम्प्युटर कहा जाता है
विशिष्ट-उद्देशीय कम्प्युटर – Special Purpose Computer
ऐसे कम्प्युटर जिनको किसी विशेष कार्य की पूर्ति करने के लिए तैयार किया जाता है उनकों विशिष्ट-उद्देशीय कम्प्युटर कहा जाता है। इस तरह के कम्प्युटर मे इस्तेमाल होने वाले CPU की कार्य क्षमता उस कार्य के according होती है जिसके लिए इनको बनाया गया है। उदाहरण के लिए Film City मे ऐसे Computers का उपयोग किया जाता है इसके आलावा मौसम विज्ञान, कृषि के क्षेत्र में, अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में, चिकित्सा के आदि क्षेत्रो मे विशिष्ट-उद्देशीय कम्प्युटर का ही प्रयोग किया जाता है।
Chapter-7 : IT gadgets and their applications in Hindi – आईटी गैजेट और उनके अनुप्रयोग
IT gadgets and their applications in Hindi – आईटी गैजेट और उनके अनुप्रयोग
आईटी डिवाइस – IT Device का use “सूचना एवम् संचार प्रौद्योगिकी” के लिए किया जाता है। आईटी डिवाइस के अंतर्गत आज के समय इस्तेमाल होने वाले सभी संचार उपकरण आते है जैसे कि फोन, कम्प्यूटर , टेलीविज़न आदि। इसके अतिरिक्त आईसीटी गैजेट्स में वो सभी डिवाइस आते है जो इंटरनेट एवम् वायरलेस टेक्नोलॉजी दोनों मे शामिल रह्ते हैं जैसे कि टेलीफोन , hotspot डिवाइस आदि। || IT gadgets and their applications in Hindi ||
आधुनिक युग मे अगर देखा जाये तो आईटी गैजेट्स, मानव जीवन के अभिन्न अंग बन चुके है जिनको व्यक्तियों एवम् व्यापार की आवश्यकतानुसार डिजाइन किया गया है इन आईसीटी गैजेट्स की मदद से व्यापार करना इतना सरल हो गया है कि कोई भी व्यक्ति , किसी भी व्यक्ति से कहीं भी और कभी भी बात कर सकता है और साथ ही वीडियो चैट भी कर सकते है ।
आईटी गैजेट्स निम्न प्रकार के होते है :-
- मोबाइल – Mobile
- टीवी – TV
- टेबलेट पीसी – Tablet PC
- स्मार्ट वॉच – Smart Watch
- डेस्कटॉप पीसी – Desktop PC
- लैपटॉप – Laptop
- नोटबुक – Notebooks
- ड्रोन कैमरा – Drone Camera
आधुनिक युग मे अगर हम अपने चारो तरफ देखे तो ज्यादातर हर field मे, मोबाइल , टीवी और कम्प्यूटर का सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है एक ही व्यक्ति कम्प्यूटर क द्वारा सैकड़ों कार्य कर सकता है
IT गैजेट्स के उपयोग:-
- व्यापार के क्षेत्र मे सहायक
- कम्युनिकेशन मे सहायक
- मनोरंजन मे सहायक
- शिक्षा के क्षेत्र मे सहायक
- ऑनलाइन प्लेटफोर्म मे कार्य को बढ़ावा देना
व्यापार के क्षेत्र मे सहायक:
संक्षिप्त में अगर कहे तो आईटी गैजेट ने तो जैसे व्यापार करने का तरीका ही बदल दिया है अगर किसी दुकांदार को बाहर से कुछ सामान मंगाना है तो वह तुरंत मोबाइल से सम्पर्क स्थापित कर , अपने माल का ऑर्डर दे देता है और समय पर उसको वह माल प्राप्त हो जाता है इस प्रकार उसका काफी समय बच जाता है
कम्युनिकेशन मे सहायक:
मोबाइल एक ऐसा यंत्र है कि कोई भी इमरजेंसी होने पर एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से तुरंत संपर्क स्थापित कर सकता है तथा होने वाली समस्या से तुरंत बच सकता है अथवा अपनी आवश्यकता को पूरा कर सकता है
मनोरंजन मे सहायक:
मनोरंजन एक ऐसा क्षेत्र है जहा हर व्यक्ति अपने व्यस्त समय मे से थोड़ा समय निकालकर मनोरंजन के क्षेत्र मे व्यतीत करना चाहता है आज मनोरंजन के लिये विभिन्न प्रकार के आईटी गैजेट उप्लब्ध है जिसमें सबसे ज्यादा पॉपुलर टीवी है हर व्यक्ति टीवी के द्वारा म्यूजिक और विडिओ के माध्यम से अपना मनोरंजन कर सकता है
शिक्षा के क्षेत्र मे सहायक:
शिक्षा के क्षेत्र मे आईटी गैजेट का अपना अलग ही महत्व्पूर्न योगदान है आजकल स्कूल एवम् कोलेजस मे क्लासेज लेने के लिये प्रोजेक्टर जैसे गैजेट का इस्तेमाल किया जा रहा है इसके अतिरिक्त कम्प्यूटर एक ऐसा गैजेट है जिसके द्वारा कोचिंग और ऑनलाइन पढ़ाई भी की जा सकती है ऑनलाइन पढ़ाई करने के लिये इंटरनेट की आवश्यकता होती है जो इंटरनेट डिवाइस के द्वारा सम्भव है।
ऑनलाइन प्लेटफोर्म मे कार्य को बढ़ावा देना:
आजकल ज्यादातर व्यक्ति अपने कार्य को ऑनलाइन ले जाना चाहते है ताकि वह अपने कार्य को आसानी से और जल्दी पूरा कर सके। ऑनलाइन प्लेटफोर्म पर कार्य करने के लिये तरह तरह के गैजेट उप्लब्ध हो गये है जैसे कि टेबलेट , पल्मटॉप , मोबाइल आदि ।
IT गैजेट्स के प्राथमिक उपयोगिता – :- IT gadgets and their applications in Hindi.
- आईटी गैजेट्स के द्वारा बातचीत को आसान बनाया जा सकता है।
- आईटी गैजेट्स के द्वारा व्यापार करना काफी सरल हो गया हैं।
- आईटी गैजेट्स आईटी गैजेट्स के द्वारा हम मनोरंजन का भरपूर आनंद ले सकते हैं।
- आईटी गैजेट्स के द्वारा शिक्षा में पढ़ाई को लेकर काफी आसानी हो जाती है।
- आईटी गैजेट्स के द्वारा ऑनलाइन शॉपिंग , विज्ञापन करना काफी आसान हो गया है ।
Chapter-8 : Basics of Hardware and Software in Hindi – हार्डवेयर एवम् सॉफ्टवेयर
1. Basics of Hardware and Software in Hindi – हार्डवेयर एवम् सॉफ्टवेयर
Basics of Hardware and Software in Hindi :- कंप्यूटर सिस्टम के अंतर्गत, हार्डवेयर एक भौतिक पेरिफेरल डिवाइस हैं जिसको स्पर्श तथा महसूस किया जा सकता है इसके अतिरिक्त सॉफ्टवेयर को भौतिक रूप से स्पर्श नहीं किया जा सकता है सॉफ्टवेयर वे प्रोग्राम है जिनकी सहायता से हार्डवेयर पार्ट्स को आपस में एक दूसरे से संयोजन किया जाता है।
2. Computer Hardware – कंप्युटर हार्डवेयर
कम्प्यूटर एक भौतिक उपकरण है जिसके सभी भागो को देखा अथवा छुआ जा सकता है कंप्यूटर सिस्टम को अलग – अलग पार्ट्स से मिलाकर बनाया जाता है जैसे कि मॉनिटर , कीबोर्ड, माउस, सीपीयू आदि ये सब कंप्यूटर हार्डवेयर के भाग है। कंप्यूटर सिस्टम के अंतर्गत हार्डवेयर पार्ट्स को आसानी से हम संशोधित नहीं कर सकते है, परंतु सॉफ़्टवेयर को हम आवश्यकतानुसार संशोधित या उसमें कुछ बद्लाव भी कर सकते है।
Types of Hardware – हार्डवेयर के प्रकार
- Input Device – इनपुट डिवाइस
- Output Device – आउटपुट डिवाइस
- Processing Device – प्रोसेसिंग डिवाइस
Input Device – इनपुट डिवाइस
इनपुट डिवाइस का कार्य, डाटा एवम निर्देशों को कंप्यूटर में इनपुट कराना होता है। सीपीयू इस डाटा को प्रोसेस कर हमे आउटपुट देता है।
Types of Input Device – इनपुट डिवाइस के प्रकार
- Keyboard – कीबोर्ड
- Mouse – माउस
- Scanner – स्केनर
- Joystick – जॉयस्टिक
- Touch Screen – टच स्क्रीन
- Digital Camera – डिजिटल कैमरा
- Light Pen – लाइट पेन
- Trackball – ट्रैकबॉल
- Barcode Reader – बारकोड रीडर
- OMR – Optical Mark Recognition
- MICR – Magnetic Ink Character Recognition
Output Device – आउटपुट डिवाइस
वे पेरीफेरल डिवाइस, जो कम्प्यूटर द्वारा इनपुट किये गये डेटा को प्रोसेस कर उनको आउटपुट के रूप मे डिस्प्ले करता है , उनकों आउटपुट डिवाइस कहा जाता है। कंप्यूटर हार्डवेयर के अंतर्गत प्रयोग होने मुख्य आउटपुट डिवाइस निम्न प्रकार से है :
- Monitor – मॉनिटर
- Plotter – प्लॉटर
- Printer – प्रिंटर
- Headphones – हेडफोन
- Speaker – स्पीकर
- Projector – प्रोजेक्टर
Processing Device – प्रोसेसिंग डिवाइस
कम्प्यूटर सिस्टम के अंतर्गत प्रोसेसिंग से सम्बन्धित होने वाली सभी क्रियाएँ प्रोसेसिंग यूनिट के द्वारा की जाती है प्रोसेसिंग यूनिट को हम CPU के नाम से जानते है CPU का पूरा नाम Central Processing Unit हैं इसको कंप्यूटर का दिमाग (brain) भी कहा जाता हैं| CPU, यूजर के द्वारा दिए गए इनपुट डेटा को प्रोसेस कर उसको इंफॉर्मेशन में बदलने का कार्य करता है, यह कंप्यूटर का सबसे मुख्य भाग होता है, इसके अतिरिक्त CPU का कार्य कंप्यूटर से जुड़े हुए हर एक डिवाइस को नियंत्रित करना होता है|
सीपीयू को तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है:-
- ALU (Arithmetic Logic Unit)
- MU (Memory Unit)
- CU (Control Unit)
ALU – Arithmetic Logic Unit
ALU (अर्थमेटिक लॉजिक यूनिट), यह कंप्यूटर हार्डवेयर के अंतर्गत एक डिजिटल सर्किट के रूप में होता है, ALU का प्रयोग Basic Arithmetic Operation के लिए किया जाता है अर्थमेटिक लॉजिक यूनिट (ALU) का मुख्य कार्य अंकगणितीय गणनाओ को करना होता है अंकगणितीय गणनाये जैसेकि जोड़ना, घटाना, गुणा करना, भाग करना आदी | इसके अतिरिक्त तर्क संबंधित जैसे कार्य जैसेकि तुलना करना, मिलान करना, , चयन करना, डाटा को आपस में merge करने का आदि |
MU – Memory Unit
कंप्यूटर सिस्टम के अंतर्गत, मेमोरी का use हम डेटा एवम् प्रोग्राम को स्थाई अथवा अस्थाई रूप से , स्टोर करने के लिए करते है। इस स्टोर किये हुए डेटा को हम future मे आवश्यकता पड़ने पर अपनी जरुरत के अनुसार प्रयोग भी कर सकते है।
कंप्यूटर सिस्टम मे मेमोरी के बिना कोई भी रिकॉर्ड कम्प्यूटर मे स्टोर करके नही रखा जा सकता । मेमोरी मे सभी डेटा और इन्फॉर्मेशन , बाइनरी नंबर ( 0, 1 ) की फोर्म में स्टोर रहता है ।
CU – Control Unit
CU का पूरा नाम कंट्रोल यूनिट – Control Unit है यह CPU (Central Processing Unit) का एक मुख्य भाग होता है जो कम्प्यूटर के कम्पोनेंट की गतिविधियों के बीच सामंजस्य स्थापित करता है। यह CPU से जुड़े विभिन्न प्रकार के डिवाइसेज को कंट्रोल करता है जैसे इनपुट डिवाइस , आउटपुट डिवाइस तथा अर्थमेटिक लॉजिक यूनिट, यह मेमोरी के बीच डेटा तथा इंफार्मेशन का आदान-प्रदान को भी control करता है |
3. Computer Software – कंप्युटर सॉफ्टवेयर
Basics of Hardware and Software in Hindi :- निर्देशों अथवा प्रोग्रामों के समूह को सॉफ्टवेयर कहते है, यह यूजर एवम् कंप्यूटर के बीच में इंटरफेस को स्थापित करता है। अर्थात यूजर बिना सॉफ्टवेयर की सहायता से कम्प्यूटर में कोई भी कार्य नहीं कर सकता । सॉफ्टवेयर को भौतिक रूप से छुआ नहीं जा सकता , केवल उसको देखा जा सकता हैं
सॉफ्टवेयर के प्रकार – Types of Computer Software
- एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर – ( Application Software )
- सिस्टम सॉफ्टवेयर – ( System Software )
- यूटिलिटी सॉफ्टवेयर – ( Utility Software )
Chapter-8.1 : Computer Software in Hindi – कंप्युटर सॉफ्टवेयर
Computer Software in Hindi :- प्रोग्रामिंग भाषा में लिखे जाने वाले निर्देशों अथवा प्रोग्रामों के समूह को सॉफ्टवेयर कहते है सॉफ्टवेयर, यूजर और कंप्यूटर के मध्य इंटरफेस स्थापित करते है। अर्थात हम ये कह सकते है कि यूजर बिना सॉफ्टवेयर की मदद से कम्प्यूटर में कार्य नहीं कर सकता है। सॉफ्टवेयर एक ऐसा भाग है जिसको छुआ नहीं जा सकता , केवल उसको देखा जा सकता हैं
कम्प्यूटर में जितने भी कार्य किये जाते है वो सभी कार्य सॉफ्टवेयर के द्वारा ही संपन किये जाते हैं. आजकल बडी़ बडी़ सॉफ्टवेयर कंपनियां, यूजर एवम् उपभोक्तओं की आवश्यकता अनुसार, सॉफ्टवेयर का निर्माण करती है। जैसे की अगर किसी यूजर को अकाऊंट से सम्बंधित कार्य करना होता है तो उसके लिये यूजर को अकाऊंट का सॉफ्टवेयर चाहियें । यूजर को , एक ही तरह के कार्य करने के लिये मार्केट मे अनेक प्रकार के सॉफ्टवेयर मिल जायेंगे जिनमें से कुछ सॉफ्टवेयर तो बिल्कुल फ्री में उपलब्ध है तथा कुछ सॉफ्टवेयर को खरीदना पड़ता है।
“Software is a Collection of Programs”
सॉफ्टवेयर कि आवश्यकता
- कम्प्यूटर सिस्टम को चलाने के लिए
- कम्प्यूटर में डेटा को मैनेज करने के लिए
- किसी भी डाक्यूमेंट को टाइप करने के लिए
- चार्ट एवम् आरेख का निर्माण करने के लिए
- प्रस्तुतीकरण को बनाने के लिए
- कम्प्यूटर सिस्टम में इंटरनेट का प्रयोग करने के लिए
Types of Computer Software – सॉफ्टवेयर के प्रकार
- एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर – Application Software
- सिस्टम सॉफ्टवेयर – System Software
- यूटिलिटी सॉफ्टवेयर – Utility Software
Application Software – एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर
वह प्रोग्राम, जिनका प्रयोग हम किसी विशेष कार्य को पूरा करने के लिये करते है एप्लिकेशन सॉफ्टवेयर कह्लाते है। यूजर की आवश्यकताओ के अनुसार ही कंपनियां सॉफ्टवेयर का निर्माण करती हैं| उदाहरण के लिए जैसे कि Tally Prime एक ऐसा सॉफ्टवेयर है जिसके द्वारा पुरे बिजनेस को ऑपरेट किया जा सकता है ,इसके अतिरिक्त और भी सॉफ्टवेयर है जैसे कि MS-Office, फोटोशॉप ,म्यूजिक प्लेयर और मीडिया प्लयेर आदि इन सभी का इस्तेमाल भी किसी विशेष कार्य को पुरा करने के लिए किया जाता हैं। आज मार्केट मे अनेको प्रकार के एप्लिकेशन सॉफ्टवेयर उप्लब्ध है।
“एप्लिकेशन सॉफ्टवेयर उन सॉफ्टवेयर्स को कहा जाता है जो यूजर और कंप्यूटर के मध्य इंटरफेस स्थापित करते है।“
कुछ एप्लिकेशन सॉफ्टवेयर के उदाहरण निम्न प्रकार से है:-
- टैली प्राइम – Microsoft Office
- फोटोशॉप – Photoshop
- कोरल ड्रॉ – CorelDraw
- पेजमेकर – PageMaker
- एमएस-ऑफिस – MS – Office
- विंडोज़ मीडिया प्लेयर – Windows Media Player
System Software – सिस्टम सॉफ्टवेयर
सिस्टम सॉफ्टवेयर उन सॉफ्टवेयर को कहते है जो हमारे कंप्यूटर सिस्टम के हार्डवेयर को मैनेज एवम् नियंत्रित करते है, ताकि हमारे कम्प्यूटर मे इन्स्टॉल्ड एप्लिकेशन सॉफ्टवेयर ठीक प्रकार से कार्य कर सके | सिस्टम सॉफ्टवेयर, हमारे कंप्यूटर में लगे सभी हार्डवेयर पार्ट्स में सामंजस्य स्थापित करने का कार्य करते है
सिस्टम सॉफ्टवेयर निम्न प्रकार के होते है:
- ऑपरेटिंग सिस्टम – Operating System
- असेम्बलर – Assembler
- इंटरप्रेटर – Interpreter
- कम्पाइलर – Compiler
Utility Software – यूटिलिटी सॉफ्टवेयर
यूटिलिटी सॉफ्टवेयर का प्रयोग हम कंप्यूटर की कार्यक्षमता एवम् परफॉरमेंस को बनाये रखने के लिये करते है। अतः इनको हम सहायक प्रोग्राम अथवा सर्विस प्रोग्राम भी कह सकते है।
“यूटिलिटी सॉफ्टवेयर कंप्यूटर की कार्यक्षमता को बढ़ाने के साथ-साथ उसको कार्यशील बनाने में भी मदद करते है”
यूटिलिटी सॉफ्टवेयर के कुछ उदाहरण निम्न प्रकार से है:
- Anti-virus
- Disk Defragmenter
- Data Recovery
- Disk Checker
- Disk Cleaner
- System Diagnosis Tools
Conclusion – निष्कर्ष
कंप्यूटर के अंतर्गत हार्डवेयर एवम् सॉफ्टवेयर दोनो अलग-अलग घटक हैं इन दोनो का प्रयोग कंप्यूटर सिस्टम को चलाने के लिए किया जाता है। हार्डवेयर एक भौतिक पेरिफेरल डिवाइस हैं जिसको स्पर्श तथा महसूस किया जा सकता है जैसे कि कीबोर्ड, माउस, मॉनिटर, जॉयस्टिक, प्रिंटर एवम् सीपीयू आदि इसके अतिरिक्त सॉफ्टवेयर को भौतिक रूप से स्पर्श नहीं किया जा सकता है सॉफ्टवेयर वे प्रोग्राम है जिनकी सहायता से हार्डवेयर पार्ट्स को आपस में एक दूसरे से संयोजन किया जाता है। सॉफ्टवेयर के कुछ उदाहरण है जैसे कि टैली प्राइम , फोटोशॉप, कोरल ड्रॉ, पेजमेकर, एमएस-ऑफिस आदी।
Chapter-8.3 : Output Device क्या है ? आउटपुट डिवाइस के प्रकार
1. Output Device क्या है ?
Output Device क्या है :- वे डिवाइस, जो कम्प्यूटर द्वारा इनपुट किये गये डेटा को प्रोसेस कर उनको आउटपुट के रूप मे डिस्प्ले करता है , उनकों आउटपुट डिवाइस कहा जाता है जैसे कि मॉनिटर, प्रिंटर, स्पीकर आदि ।
“वे डिवाइस जिनके द्वारा कंप्यूटर से प्राप्त परिणामों को आउटपुट के रूप में प्रदर्शित किया जाता है आउटपुट डिवाइसेज कहलाती हैं ”
॥ Output Device क्या है ॥
2. Types of output Device – आउटपुट डिवाइस के प्रकार
- Monitor – मॉनिटर
- Plotter – प्लॉटर
- Printer – प्रिंटर
- Headphones – हेडफोन
- Speaker – स्पीकर
- Projector – प्रोजेक्टर
2.1. Monitor – मॉनिटर
मॉनिटर, कम्प्यूटर हार्डवेयर का सबसे महत्वपूर्ण भाग है। जिसको विजुअल डिस्प्ले यूनिट – Visual Display Unit भी कहते है। मॉनिटर का कार्य CPU के द्वारा प्रोसेस किये हुए डेटा को output के रूप मे प्रदर्शित करना होता है। आधुनिक युग मे मॉनिटर का डिजाइन देखने मे बिल्कुल LCD की तरह होता है। लेकिन पुराने समय मे मॉनिटर का डिजाइन CRT मॉनिटर की तरह होता था जो वजन मे भी काफी भारी होते थे, उन मॉनिटर मे CRT – Cathode Ray Tubes टेक्नोलॉजी का प्रयोग होता था।
कंप्यूटर मॉनिटर के प्रकार :
- CRT Monitor – सीआरटी मॉनिटर
- TFT Monitor – टीएफटी मॉनिटर
- LCD Monitor – एलसीडी मॉनिटर
- LED monitor – एलईडी मॉनिटर
- OLED Monitor – ओलेड मॉनिटर
- CRT monitor – सीआरटी मॉनिटर:
कम्प्यूटर के अंतर्गत इन मॉनिटर का प्रयोग पुराने समय मे किया जाता था जिसमें CRT अर्थात Cathode Ray Tube टेक्नोलॉजी का प्रयोग किया जाता था जो साइज मे बहुत बड़े और वजन मे काफी भारी होते थे तथा इनमें बिजली की खपत भी ज्यादा होती थीं।
TFT monitor – टीएफटी मॉनिटर:
सीआरटी मॉनिटर के बाद जैसे-जैसे टेक्नोलॉजी मे बढ़ोतरी हुई वैसे-वैसे ही नये-नये आविष्कार का जन्म होने लगा, अब सीआरटी मॉनिटर की जगह TFT ने लेली थीं।
TFT को हम Thin Film Transistor के नाम से भी जानते है ये मॉनिटर सीआरटी मॉनिटर की अपेक्षा मे काफी अच्छी picture क्वालिटी provide करते है। इन मॉनिटर मे बिजली की खपत भी बहुत कम होती है।
LCD Monitor – एलसीडी मॉनिटर:
टीएफटी मॉनिटर के बाद मार्केट मे एलसीडी मॉनिटर का चलन शूरु हो गया था, जिसको बनाने मे लिक्विड क्रिस्टल – Liquid Crystal का प्रयोग होने लगा । इसलिये इन मॉनिटर को लिक्विड क्रिस्टल डिस्प्ले – Liquid Crystal Display भी कहा जाता है । ये मॉनिटर एलसीडी मॉनिटर के मुकाबले काफी अच्छे होते थे । टीएफटी मॉनिटर की अपेक्षा इनमें बिजली की खपत भी बहुत कम होती थीं तथा वजन मॆ भी इतने हल्के होते थे कि इनको एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने मे कोई समस्या नहीं होती थीं
LED monitor – एलईडी मॉनिटर:
आधुनिक युग मे एलसीडी मॉनिटर की जगह अब LED मॉनिटर ने ली है । ये मॉनिटर, एलसीडी मॉनिटर की अपेक्षा और भी बिजली कम खर्च करते है । इनमें Light-Emitting Diode टेक्नोलॉजी का प्रयोग किया गया है ये वजन मे और भी ज्यादा हल्के तथा पतले होते है इस समय एलईडी मॉनिटर का प्रयोग लैपटॉप , डेस्कटॉप , टीवी , टेबलेट , मोबाइल आदि सभी उपकरणों मे होने लगा है ।
OLED monitor – ओलेड मॉनिटर:
OLED monitor की Full From – Organic Light Emitting Diodes है। ओलेड मॉनिटर की Picture quality सबसे अच्छी होती है इसका विजुअल एक्सपीरियंस सबसे अच्छा होता है इस मॉनिटर मे भी बिजली की खपत बहुत कम होती है यह टेक्नोलॉजी Led मॉनिटर की अपेक्षा बहुत महंगी होती है।
2.2. Plotter – प्लॉटर
प्लॉटर एक आउटपुट डिवाइस है इसका आविष्कार रेमिंगटन-रैंड ने सन् 1953 मे किया गया था। प्लॉटर का डिजाइन प्रिंटर की तरह होता है प्लॉटर का प्रयोग करके हम किसी भी तरह की ड्राइंग ,चार्ट एवम् ग्राफ आदि को प्रिंट कर सकते हैं आजकल मार्केट मे जो बड़े – बड़े बैनर अथवा पोस्टर लगे दिखाई देते उन सबको प्लॉटर के द्वारा ही प्रिंट किया जाता हैं| प्लॉटर के द्वारा 3D पोस्टर को भी प्रिंट किया जा सकता हैं
2.3. Printer – प्रिंटर
प्रिंटर का प्रयोग हम डिजिटल इंफार्मेशन को प्रिन्ट करने के लिये करते है | यह एक ऐसी इलेक्ट्रॉनिक डिवाईस है जो कि कम्प्युटर में स्टोर दस्तावेज़ों की सॉफ्ट कॉपी को हार्ड कॉपी में कन्वर्ट करने का कार्य करती हैं। विभिन्न- विभिन्न प्रकार के पेपर साइज के अनुसार, मार्केट मे अलग अलग तरह के प्रिंटर उप्लब्ध है जिनका प्रयोग करके हम टेक्स्ट तथा चित्र आदि को पेपर पर प्रिंट कर सकते है |
2.4. Headphones – हेडफोन
हेडफ़ोन एक ऐसा उपकरण है जिसमें छोटे – छोटे लाउडस्पीकर लगे होते है, हेडफ़ोन के माध्यम से यूजर किसी भीं दूसरे युजर से आसानी से बाते कर सकता है आमतौर पर ज्यादातर लोग हेडफ़ोन का इस्तेमाल ऑनलाइन चैटिंग के लिये करते है
2.5. Speaker – स्पीकर
कंप्यूटर स्पीकर एक आउटपुट डिवाइस है जिसका प्रयोग ध्वनि को उत्पन्न करने के लिए किया जाता है, स्पीकर एक ऐसा यंत्र है जिसको कंप्यूटर के साथ अलग से जोड़ा जाता है जिसका मुख्य उद्देश्य कंप्यूटर के माध्यम से ऑडियो साउंड को सुनना होता है. यह स्पीकर कंप्यूटर से प्राप्त इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल को ऑडियो में बदल देता है।
आज के समय में सभी लोग मल्टीमीडिया, गेम्स, ऑडियो, विडिओ आदि को एंटरटेनमेंट के लिये ज्यादा इस्तेमाल कर रहे है जिसमें स्पीकर की विशेष महत्व है Speaker दो प्रकार के होते है, जैसे कि – Passive Speaker और Powered Speaker, Passive Speaker के अंतर्गत इन्टरनल एम्पलीफायर का समावेश नही होता है, क्योकि इसको, एक स्पीकर वायर का इस्तेमाल करके एम्पलीफायर से जोड़ा जाता है इसके विपरीत Powered Speakers में इन्टरनल एम्पलीफायर मौजूद रहता है जिसके द्वारा हम साउंड वॉल्यूम को बढ़ा सकते है।
2.6. Projector – प्रोजेक्टर
प्रोजेक्टर का आविष्कार सन 1894 में चार्ल्स फ्रांसिस जेनकिंस के द्वारा किया गया था। प्रोजेक्टर भी आउटपुट डिवाइस के अंतर्गत आता हैं प्रोजेक्टर का प्रयोग करके हम किसी भी इमेज अथवा वीडियो को एक प्रोजेक्शन स्क्रीन (सफेद परदा) पर प्रदर्शित कर अपने युजर्स को दिखा सकते हैं। है। आज के समय में प्रोजेक्टर का अधिकांश प्रयोग कांफ्रेंस रूम, क्लासरूम और मूवी थिएटर में किया जाता है
प्रोजेक्टर को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया गया हैं
- मूवी प्रोजेक्टर
- वीडियो प्रोजेक्टर
- स्लाइड प्रोजेक्टर
Chapter-8.4 : Printer क्या है एवम् इसके प्रकार || Plotter क्या है
प्रिंटर क्या है ? – What is Printer ?
Printer क्या है :- प्रिंटर एक आउटपुट डिवाइस है जिसका प्रयोग हम डिजिटल इंफार्मेशन को पेपर पर प्रिन्ट करने के लिये करते है | यह एक ऐसी इलेक्ट्रॉनिक डिवाईस है जो कम्प्युटर में स्टोर दस्तावेज़ों अथवा डाक्यूमेंट की सॉफ्ट कॉपी को हार्ड कॉपी में कन्वर्ट करने का कार्य करती हैं।
कम्प्युटर में स्टोर दस्तावेज टेक्स्ट एवम् ग्राफ़िक के रूप में हो सकते है | मार्केट मे प्रिंटर के अलग – अलग साइज उप्लब्ध है जिसमें विभिन्न- विभिन्न प्रकार के पेपर साइज के अनुसार प्रिंट निकाला जा सकता है प्रिंटर द्वारा हम किसी भी डाक्यूमेंट ब्लैक एँड व्हाइट अथवा कलर प्रिंट आउट निकाल सकते है |
इसके अतिरिक्त प्रिंटर की गति को हम निम्न इकाइयों में माप सकते है जैसे कि CPS- ( Character Per Second ) , LPS- ( Lines Per Second ) और PPS- ( Pages Per Seconds ) , इन प्रिंटर को कंप्यूटर से जोड़ने के लिये हमे यूएसबी प्रिंटर केबल का प्रयोग करना पड़ता है | आज के समय में प्रिंटर की ऐसी ऐसी टेक्नोलॉजी उप्लब्ध है जिसके माध्यम से हम प्लास्टिक शीट, काग़ज़ और कपड़े पर भी प्रिंटआउट ले सकते है |
वर्तमान युग में प्रिंटर को बनाने वाली बहुत सी कंपनियां है जो विभिन्न आकारों और विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए प्रिंटर का उत्पादन करती है जैसे कि – HP (Hewlett Packard), Epson, Canon, Samsung, Panasonic आदी |इनमें से सबसे प्रमुख कंपनियां Epson और HP है
प्रिंटर के प्रकार – Types Of Printer
प्रिंटर को दो भागो मे बाटा गया है़ |
- इम्पैक्ट प्रिंटर्स – Impact Printers
- नॉन-इम्पैक्ट प्रिंटर्स – Non Impact Printers
इम्पैक्ट प्रिंटर्स – Impact Printers :
जिस प्रकार एक टाइपराइटर कार्य करता है ठीक उसी प्रकार से इम्पैक्ट प्रिंटर्स भी कार्य करते है इम्पैक्ट प्रिंटर्स का प्रयोग दस्तावेज़ों अथवा डाक्यूमेंट को प्रिन्ट करने के लिये किया जाता है। इन प्रिंटर्स मे, अक्षर को पपेर पर प्रिन्ट करने के लिए छोटे-छोटे पिन लगे होते हैं। इन पिनों पर छोटे – छोटे अक्षर छपे हुए होते हैं। जब भी हमे किसी पपेर पर प्रिन्ट आउट चहिये होता है तो ये पिने रिबन से टकराती है और रिबन मे लगी स्याही के द्वारा पेपर पर अक्षर प्रिन्ट होने लगते हैं। ये प्रिंटर एक – एक करके करेक्टर को प्रिन्ट करते है।
इंपैक्ट प्रिंटर के प्रकार – Types Of Impact Printer
- डॉट मेट्रिक्स प्रिंटर
- डेजी व्हील प्रिंटर
- ड्रम प्रिंटर
- लाइन प्रिंटर
- चेन प्रिंटर
नॉन-इम्पैक्ट प्रिंटर्स – Non Impact Printers :
नौन – इम्पैक्ट प्रिंटर्स का प्रयोग भी दस्तावेज़ों अथवा डाक्यूमेंट को प्रिन्ट करने के लिये किया जाता है। इनकी विशेषता यह है कि ये प्रिंटर कार्य को बहुत ते़जी से करते है और पेपर को प्रिंट करते समय आवाज भी ज्यादा नही करते क्योंकि इन प्रिंटर्स मे cartridge , print head , और paper के मध्य भौतिक संपर्क स्थापित नहीं होता। इन प्रिंटर्स के द्वारा हम Color एवम् black & white प्रिन्ट आउट भी ले सकते है तथा इनकी प्रिंटिंग क्वालिटी भी इम्पैक्ट प्रिंटर्स के मुकाबले काफी अच्छी होती है लेकिन ये प्रिंटर, impact printer की अपेक्षा कीमत में काफी ज्यादा होते है।
नौन – इंपैक्ट प्रिंटर के प्रकार – Types of Non-Impact Printer
- इंकजेट प्रिंटर
- लेजर प्रिंटर
- फोटो प्रिंटर
- पोर्टेबल प्रिंटर
- थर्मल प्रिंटर
- इलेक्ट्रो स्टैटिक प्रिंटर
- इलेक्ट्रो मैग्नेटिक प्रिंटर
Printer क्या है || Printer क्या है || Printer क्या है || Printer क्या है || Printer क्या है
प्लॉटर क्या है ? What is Plotter ?
Plotter सन् 1953 मे विकसित किया गया था जिसका निर्माण रेमिंगटन-रैंड ने किया था। इसका डिजाइन लगभग प्रिंटर की तरह ही होता है यह एक output device है जिसको ग्राफिक प्रिंटर भी कहा जाता है इसका प्रयोग करके हम किसी भी तरह की Drawing अथवा चित्र, ग्राफ चार्ट आदि को प्रिंट कर सकते हैं आजकल हम मार्केट मे देखते है कि हर दुकान के सामने अथवा किसी कम्पनी मे भी तरह – तरह के बड़े – बड़े बैनर अथवा पोस्टर लगे होते है इन सबको प्लॉटर के द्वारा ही प्रिंट किया जाता हैं| यह एक ऐसी मशीन है जिसके द्वरा 3D पोस्टर भी प्रिंट किये जा सकते हैं
Chapter-8.5 : What is Ram ? , रैम क्या है ?
What is Ram , रैम क्या है ?
What is Ram :- Ram को हम Random access memory के नाम से जानते है इसको कंप्यूटर की main मैमोरी भी कहा जाता है | जब हम कम्प्यूटर मे किसी कार्य को पूरा करने के लिये कोई सॉफ्टवेयर अथवा प्रोग्राम को खोलते है तो वह प्रोग्राम सबसे पहले temporary रूप मे रैम मे जाकर store होता है ताकि हम अपना कार्य कर सके | रैम को एक Volatile मेमोरी भी कहा गया है क्योकि इसमें जो डेटा स्टोर किया गया है वह permanently स्टोर नही रहता , वह तब तक इसमे रहता है जब तक की कंप्यूटर सिस्टम off नहीं हो जाता है |
Ram को दो भागो मे बाटा गया है |
- डाइनैमिक रैम – Dynamic Ram
- स्टैटिक रैम – Static Ram
डाइनैमिक रैम – Dynamic Ram:
इस मेमोरी को सन् 1970 मे विकसित किया गया था, जिसका प्रयोग हार्डवेयर एवम वीडियो गेम्स कंसोल मे किया गया । DRAM को हम Dynamic Random Access Memory – डायनामिक एक्सेस मैमोरी के नाम से भी जानते है। इसमें डेटा को सुरक्षित रखने के लिये एक refresh Circuit का इस्तेमाल किया जाता है जो इस मेमोरी को बार बार refresh करता रहता है। इस मेमोरी को Capacitor और Transistor की साहयता से बनाया जाता है।
Advantages of DRAM:
- यह मेमोरी SRAM की अपेक्षा सस्ती होती है।
- SRAM की अपेक्षा इस मेमोरी का साइज बहुत ही कम होता है।
- इसको मेमोरी को develop करने मे लागत कम आती है।
- DRAM की Memory Capacity ज्यादा होती है।
- इस memory का cell स्ट्रक्चर simple होता है।
- यह साइज मे बहुत छोटी होती है।
Disadvantages of DRAM:
- SRAM की अपेक्षा इसकी स्पीड बहुत ही कम होती है।
- Power चले जाने पर इसमें store डेटा delete हो जाता है।
- यह मेमोरी power का ज्यादा consumption करता है।
Characteristics of DRAM:
- इस मेमोरी का साइज बहुत ही कम होता है।
- इस मेमोरी को बार – बार रेफ्रेश करने की आवश्यकता होती है।
- इस मेमोरी प्रयोग cache Memory के लिए होता है।
- इसकी कार्य करने की स्पीड काफी कम होती है।
- यह मेमोरी बहुत ही सस्ती होती है।
- इस मेमोरी को कार्य करने के लिये कम पॉवर की जरूरत होती है।
स्टैटिक रैम – Static Ram:
इस मेमोरी को कार्य करने के लिये लगातार Electric Power अर्थात बिजली की आवश्यकता पड़ती है। इस मेमोरी मे, डेटा को स्थिर रखने के लिये मेमोरी को बार बार refresh करने की आवश्यकता नहीं पड़ती । SRAM को विकसित करने के लिये जो लागत आती है वह DRAM के मुकाबले थोड़ी ज्यादा होती है इस मेमोरी को कार्य करने के लिये ज्यादा power की जरूरत होती है।
Advantages of SRAM:
- यह मेमोरी DRAM की अपेक्षा तेज होती है।
- इस मेमोरी मे बिजली की खपत कम होती है।
- इस मेमोरी को Refresh करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है।
Disadvantages of SRAM:
- यह मेमोरी DRAM की अपेक्षा महंगी होती है।
- इसकी Memory क्षमता कम होती है।
- इसकी storage capacity भी कम होती है।
- इसकी Manufacturing cost – लागत ज्यादा होती है।
Characteristic of SRAM:
- इसकी कार्य करने की स्पीड काफी तेज़ होती है।
- इस मेमोरी को Cache Memory के लिये प्रयोग किया जाता है।
- इस मेमोरी का साइज DRAM के मुकाबले ज्यादा होता है।
- इस मेमोरी को बार बार refresh करने की आवश्यकता नहीं पड़ती
- यह मेमोरी ज्यादा दिनों तक कार्य कर सकती है।
- इस मेमोरी को कार्य करने के लिये ज्यादा power की जरूरत होती है।
- यह मेमोरी costly होती है।
Chapter-8.6 : ROM क्या है तथा ROM के प्रकार || Cache Memory – कैश मेमोरी
ROM क्या है तथा ROM के प्रकार
ROM क्या है :- ROM को कंप्यूटर की main मैमोरी के अंतर्गत रखा गया है जिसको हम Read Only Memory के नाम से भी जानते है | इस मेमोरी को Non-Volatile Memory भी कहते है क्योकि इस मेमोरी मे जो डेटा एक बार store कर दिया जाता है वह कम्प्यूटर को बंद करने पर भी erase नहीं होता, जबकि Ram मे वो डेटा erase हो जाता है
ROM मे कंपनी या manufacturer द्वारा वो Program स्टोर किये जाते है, जिनकी आवश्यकता हमे Computer या किसी अन्य डिवाइस को जैसे कि टेबलेट, मोबाइल आदि को ON करते समय पड़ती है। एक तरह से हम ये कह सकते है कि Rom मे डेटा हमेशा के लिये ( Permanently ) स्टोर हो जाता है ।
ROM को तीन भागो मे बाटा गया है |
- PROM – Programmable Read-Only Memory
- EPROM – Erasable and Programmable Read-Only Memory
- EEPROM – Electrically Erasable and Programmable Read-Only Memory
PROM – Programmable Read-Only Memory
इस मेमोरी को Programmable Read-Only Memory कहा जाता है। यह मेमोरी बिल्कुल Blank होती है क्योकि इस मेमोरी मे कंपनी द्वारा कोई भी प्रोग्राम अथवा डेटा को स्टोर नही किया जाता है। इस Memory के अंतर्गत छोटे- छोटे fuse लगे होते हैं, जिसमें हम प्रोग्रामिंग के द्वारा डेटा अथवा instructions को डाल सकते है। इस Memory मे एक बार प्रोग्राम डालने के बाद उसको delete नहीं किया जा सकता है। एक तरह से हम इसको One-Time Programmable Device भी कह सकते है। इस मेमोरी का प्रयोग Mobile, Video Game आदि में प्रयोग किया जाता है।
EPROM – Erasable and Programmable Read-Only Memory
इस Memory के अंतर्गत डेटा अथवा इन्फॉर्मेशन को Erase भी किया जा सकता है। तथा आवश्यकता पड़ने पर इस मेमोरी मे फिर से प्रोग्रम को डाला जा सकता है। Ultra Violet Light एक ऐसा तरीका है जिसके द्वारा यह Memory कुछ ही Minutes मे बिल्कुल खाली हो जाती है। इस तकनीक के अंतर्गत Instructions को delete करने के लिये 40 मिनट तक अल्ट्रावॉयलेट लाइट का प्रयोग किया जाता है। इस मेमोरी के अंतर्गत बिजली की खपत ज्यादा होती है
EPROM के लाभ निम्नलिखित है:-
- इस मेमोरी को दुबारा से प्रोग्राम किया जा सकता है.
- यह मेमोरी बहुत ही सस्ती है.
- पॉवर चले जाने पर भी इस मेमोरी में डेटा स्टोर रहता है.
- इस मेमोरी के अंतर्गत टेस्टिंग और डिबगिंग को आसानी से किया जा सकता है.
EEPROM – Electrically Erasable Programmable Read-Only Memory
समय के साथ-साथ जैसे जैसे टेक्नोलॉजी मे बद्लाव होता गया , तो टेक्नोलॉजी के हिसाब से मेमोरी मे भी बद्लाव करने की आवश्यकता होने लगी। इस मेमोरी की विशेषता यह है कि इसको 10,000 बार भी erase किया जा सकता है तथा इसमें प्रोग्राम को भी डाला जा सकता है। इस मेमोरी मे प्रोग्राम को erase करने के लिये केवल 10 मिलि-सैकिन्ड का समय लगता है।
कैश मेमोरी – Cache Memory
कैश मेमोरी कम्प्यूटर सिस्टम का महत्वपूर्ण भाग होती है जो हमारे कम्प्यूटर सिस्टम की प्रोसेसिंग स्पीड को बढ़ाती है। यह CPU को तीव्र गति से डेटा उपलब्ध कराती है तथा CPU द्वारा प्रोसेस किये गये डेटा को तेज़ गति से ग्रहण भी करती है जिसके कारण हमारे कंप्यूटर की कार्य करने की गति भी बढ़ जाती है|
यह मेमोरी size में बहुत छोटी होती है इसकी कार्य करने की गति main मेमोरी से भी ज्यादा तेज होती है, सीपीयू मे हम जिन प्रोग्राम को बार-बार खोलते है उन प्रोग्राम को यह मेमोरी अपने अंदर store करके रख लेती है, तथा CPU कोई सा भी डेटा प्रोसेस करने से पूर्व कैश मेमोरी को चैक कर लेता है की वह डेटा वहा मौजूद है या नही |
कैश मेमोरी को निम्न भागो में बाँटा गया है जैसे कि:-
- L1 cache
- L2 cache
- L3 cache
Chapter-8.7 : Secondary Memory क्या है तथा उनके प्रकार
1. Secondary Memory क्या है
Secondary Memory क्या है : -सहायक मेमोरी वह मेमोरी कहलाती है जिसको कम्प्यूटर सिस्टम मे अलग से जोड़ा जाता है , इस मेमोरी के अंतर्गत जो भी डेटा स्टोर होता है वह स्थाई रूप से (Permanently) स्टोर हो जाता है जिसको हम आवश्यकता अनुसार भविष्य मे उसका इस्तेमाल कर सकते है तथा इसमें सुधार भी कर सकते है। इसके अंतर्गत स्टोर डेटा यूजर द्वारा डिलीट भी किया जा सकता है। इस मेमोरी की डेटा स्टोर करने की क्षमता अधिक होती है तथा इस डेटा को हम एक स्थान से दूसरे स्थान तक ट्रांसफर भी कर सकते है। कॉम्पेक्ट डिस्क(CD), हार्डडिस्क (Hard Disk), फ्लॉपी डिस्क, मेमोरी कार्ड, Pen Drive इत्यादि Secondary Memory के ही example है।
2. Secondary Memory को दो भागो मे बाटा गया है:
2.1. Fixed Memory:
इस मेमोरी के अंतर्गत हम डेटा को केवल एक बार ही रिकार्ड कर सकते है अर्थात एक बार रिकॉर्ड होने पर हम उस डेटा को डिलीट नहीं कर सकते है। उदाहरण : CD , DVD आदि
2.2. Removable Memory:
इस मेमोरी के अंतर्गत हम डेटा को कितनी बार भी रिकार्ड कर सकते है अर्थात डेटा रिकॉर्ड होने के बाद हम उस डेटा को डिलीट भी कर सकते है। उदाहरण: Hard-Disk, Pen Drive, Memory Card, Floppy Disk, आदि
3. सेकेंडरी मेमोरी के प्रकार: Types of secondary memory
- हार्ड डिस्क ड्राइव – Hard Disk Drive
- पेन ड्राइव – Pen Drive
- ऑप्टिकल डिस्क – Optical Disk
- सीडी– CD
- डीवीडी – DVD
- ब्लू रेय डिस्क – Blue Ray Disk
हार्ड डिस्क ड्राइव – Hard Disk Drive:
यह एक Secondary Storage Device है जिसका निर्माण IBM कंपनी द्वारा किया गया था। हार्ड डिस्क का प्रयोग हम कंप्यूटर मे डाटा को permanently स्टोर करने के लिये करते है तथा समय समय पर आवश्यकता पड़ने पर हम उस डेटा को इस्तेमाल भी कर सकते है। यह एक नॉन- वोलेटाइल – Non – Volatile मेमोरी है इस डिवाइस मे डेटा, लम्बे समय तक स्टोर रह सकता है।
आजकल हर एक कम्प्यूटर अथवा लैपटॉप मे डेटा को सुरक्षित रखने के लिये हार्ड डिस्क का इस्तेमाल किया जाता है। हार्ड डिस्क दो प्रकार की होती है internal हार्ड डिस्क और external हार्ड डिस्क । normally सभी डेस्कटॉप कम्प्यूटर मे internal हार्ड डिस्क का इस्तेमाल किया जाता है लेकिन अतिरिक्त डेटा को स्टोर करने के लिये हम external हार्ड डिस्क का प्रयोग भी कर सकते है।
हार्ड डिस्क की स्पीड को हम RPM मे मापते है अर्थात Revolutions Per Minute मे , हार्ड डिस्क का RPM जितना ज्यादा होगा उतनी ही तेज़ गति से डेटा Read और Write होता है। Hard Disk मे डाटा को स्टोर करने के लिए disk platters लगी होती है, हर एक प्लेटर मे track और sector बने होते है जोकि spindle की सहायता से घूमते रहते है हार्ड डिस्क मे एक Read & Write हेड होता है जो प्लेटर के ऊपर डेटा को read एवम् write करने का कार्य करता रहता है आजकल मार्केट मे ज्यादातर हार्ड डिस्क 5400 RPM, 7200 RPM की मिल जाती हैं।
हार्ड डिस्क के प्रकार – Types of Hard Disk:
- PATA – Parallel Advanced Technology Attachment
- SATA – Serial Advanced Technology Attachment
- SCSI – Small Computer System Interface
- SSD – Solid State Drive
PATA – Parallel Advanced Technology Attachment
यह तकनीक Parallel Advanced Technology Attachment के नाम से जानी जाती है जिसका प्रयोग सन् 1986 मे किया गया था इस हार्ड डिस्क की स्पीड थोड़ी कम होती थीं। इसमे डेटा ट्रांसफर करने की स्पीड लगभग 133mbps थीं
SATA – Serial Advanced Technology Attachment
SATA को हम Serial Advanced Technology Attachment के नाम से भी जान सकते है आधुनिक युग मे अधिकांश कम्प्युटर एवम् लैपटाप में इसी हार्ड डिस्क का इस्तेमाल किया जाता है यह हार्ड डिस्क PATA हार्ड डिस्क की अपेक्षा तीर्व गति से कार्य करती है. अर्थात इसमें जो डाटा ट्रांसफर करने की स्पीड होती है वह अधिकांश 600 MBPS तक होती है. इस हार्ड डिस्क को CPU से connect करने के लिये SATA Cable का इस्तेमाल किया जाता है ।
SCSI – Small Computer System Interface
SCSI अर्थात Small Computer System Interface, जिसको छोटे अथवा medium साइज़ के कंप्यूटर में इस्तेमाल किया जाता है इस हार्ड डिस्क मे डेटा ट्रांसफर करने की स्पीड अधिक होती है अर्थात यह 640 MBPS की स्पीड से Data को Transfer कर सकती है। SCSI Hard Disk को कनेक्ट करने के लिए SCSI Cable का प्रयोग किया जाता है इसमे 16 Drive को एक साथ कनेक्ट किया जा सकता है।
SSD – Solid State Drive
इस हार्ड डिस्क को हम Solid State Drives के नाम से भी जानते है। आज के समय मे यह हार्ड डिस्क सबसे तीर्व गति से डेटा को ट्रांसफर करने की क्षमता रखती है इस हार्ड डिस्क मे डेटा को स्टोर करने के लिए जिस तकनीक का प्रयोग किया जाता है उसको हम Flash Memory तकनीक कहते है जिस कारण से इसमें Data को read करने की गति काफी तेज होती है. मार्केट मे इस हार्ड डिस्क की कीमत अन्य हार्ड डिस्क की अपेक्षा बहुत ज्यादा होती है।
पेन ड्राइव – Pen Drive:
पेन ड्राइव का इस्तेमाल हम डेटा को स्टोर करने के लिये करते है इस डिवाइस की मदद से हम डेटा को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जा सकते है इस डिवाइस को हम USB flash drive भी कहते है। आजकल मार्केट मे अलग –अलग साइज की पेन ड्राइव उप्लब्ध है जैसे कि 8 जीबी , 16 जीबी, 32 जीबी, 64 जीबी, 128 जीबी, 1टीबी आदि । इन पेन ड्राइव का डिजाइन बहुत ही छोटा होता है तथा यह एक पोरटेबल डिवाइस है।
ऑप्टिकल डिस्क – Optical Disk:
Optical Disk का डिजाइन गोलाकार disk की तरह होता है, जो पॉली कार्बोनेट की बनी होती है इसकी ऊपरी सतह को Aluminium प्रदर्णि की मदद से चमकदार बनाया गया है अर्थात इसकी ऊपरी सतह पर रासायनिक पदार्थ का लेप लगा होता है ताकि इस सतह पर प्रकाश परावर्तित हो सके।
ऑप्टिकल डिस्क मे कम क्षमता वाली लेजर लाइट का प्रयोग किया जाता है जिसके द्वारा डाटा को रीड एवम् राइट किया जाता है आजकल मार्केट मे डेटा की आवश्यकता को देखते हुए विभिन्न प्रकार की ऑप्टिकल डिस्क मौज़ूद है जिसमें डेटा डिजिटली रूप में safe रहता है ।
ऑप्टिकल डिस्क के प्रकार:
- सीडी – CD
- डीवीडी – DVD
- ब्लू रे – Blue Ray
सीडी– CD:
यह एक पोरटेबल डिवाइस है जिसे हम कॉम्पैक्ट डिस्क भी कहते है जिसका प्रयोग हम डेटा को रिकॉर्ड करने के लिये करते हैं। मार्केट मे यह काफी कम कीमत मे उप्लब्ध हो जाती है तथा इसका साइज 700MB तक होता हैं।
सीडी के प्रकार:
- सीडी आर – CD R
- सीडी आरडबल्यू – CD R/W
सीडी आर – CD R:
इस डिस्क मे डेटा को एक बार write कर देने के बाद उसको delete नहीं किया जा सकता है और ना ही उसको change किया जा सकता है। इस डिस्क को हम recordable compact disk भी कहते है।
सीडी आरडबल्यू – CD R/W:
इस डिस्क मे डेटा को एक बार write कर देने के बाद उसको delete भी किया जा सकता है तथा उसको फिर से दोबारा write किया जा सकता है अर्थात उसमे बार बार change भी किया जा सकता है। इस डिस्क को हम Recordable / Writable compact disk भी कहते है।
डीवीडी – DVD:
डीवीडी डिस्क का डिजाइन भी गोलाकार disk की तरह होता है इसकों हम डिजिटल वर्सटाइल डिस्क के नाम से भी जानते हैं। डीवीडी का प्रयोग हम डिजिटल सामग्री जैसे कि म्यूजिक , वीडियो , डेटा आदि को संग्रहीत (store) करने के लिये करते है मार्केट मे डीवीडी के दो version उप्लब्ध है यह 4.7 जीबी और 8 जीबी में आती है। यह सीडी के मुकाबले 7 गुना ज्यादा डेटा को store कर सकती है
डीवीडी के प्रकार:
- डीवीडी आर – DVD R
- डीवीडी आरडबल्यू – DVD R/W
ब्लू रेय डिस्क – Blue Ray Disk:
ब्लू रेय डिस्क का डिजाइन सीडी और डीवीडी की तरह गोलाकर shape में होता है जिसका प्रयोग हम High Definition की वीडियो अर्थात अच्छी quality की वीडियो को रिकॉर्ड करने के लिये करते है यह डिस्क भी Optical Disk के अंतर्गत आती है इसकी स्टोरेज क्षमता 28 जीबी तक की होती है अर्थात यह डिस्क , किसी भी ऑप्टिकल डिस्क की अपेक्षा अधिक डेटा को स्टोर करने की क्षमता रखती है।
Chapter-9 : Computer Memory and storage – कंप्यूटर मेमोरी और भंडारण
Computer Memory and storage – कंप्यूटर मेमोरी और भंडारण
Computer Memory and storage :- कंप्यूटर सिस्टम के अंतर्गत, मेमोरी का प्रयोग हम डाटा एवम् प्रोग्राम को स्थाई अथवा अस्थाई रूप से , स्टोर करने के लिए करते है। इस स्टोर किये हुए डेटा को हम भविष्य मे आवश्यकता पड़ने पर अपनी जरुरत के अनुसार प्रयोग कर सकते है।
कंप्यूटर सिस्टम मे मेमोरी सबसे महत्वपूर्ण भाग है जिसके बिना हम कोई भी रिकॉर्ड अपने कम्प्यूटर मे store करके नही रख सकते । मेमोरी मे सभी डेटा अथवा इन्फॉर्मेशन , बाइनरी नंबर ( 0, 1 ) के रूप में store रहती है । ||Computer Memory & storage||
मेमोरी इकाईयां – Memory Units
| 8 Bits | 1 Bytes |
| 1 KB (Kilobyte) | 1024 Bytes |
| 1 MB (Megabyte) | 1024 KB |
| 1 GB (Gigabytes) | 1024 MB |
| 1 TB (Terabyte) | 1024 GB |
| 1 PB (petabyte) | 1024 TB |
मेमोरी के प्रकार – Types of Memory
कम्प्यूटर मेमोरी अपनी कार्य क्षमता, स्टोरेज क्षमता एवम् स्पीड के अनुसार अलग – अलग प्रकार की हो सकती है ।
कंप्यूटर मेमोरी को दो भागो में बाटा गया हैं।
- मुख्य मेमोरी – Primary Memory
- सहायक मेमोरी – Secondary Memory
- कैश मेमोरी – Cache Memory
मुख्य मेमोरी – Primary Memory
प्राइमरी मेमोरी को हम Main Memory भी कहते है प्राइमरी मेमोरी का काम केवल उस डाटा अथवा इंफार्मेशन को स्टोर करके रखना होता है जिस डेटा पर user उस समय काम कर रहा होता है यह डेटा , मेमोरी मे temporary रूप मे स्टोर रहता है अर्थात हम ये कह सकते है कि प्राइमरी मेमोरी का इस्तेमाल हम कम्प्यूटर मे स्टोर, किसी भी प्रोग्राम को खोलने के लिये करते है| जब कम्प्यूटर को हम बंद कर देते है तो उस मेमोरी मे स्टोर डेटा , automatically डिलीट हो जाता है यह मेमोरी मार्केट मे विभिन्न साइज़ो मे उप्लब्ध है |
प्राइमरी मेमोरी को दो भागो मे बाटा गया है |
- RAM – Read Only Memory
- ROM – Random Access Memory
रैम मेमोरी के प्रकार : –
- Static Random Access Memory (SRAM)
- Dynamic Random Access Memory (DRAM)
रोम मेमोरी के प्रकार :-
- Programmable Read Only Memory (PROM)
- Erasable Programmable Read Only Memory (EPROM)
- Electronically Erasable Programmable Read Only Memory (EEPROM)
यह भी जाने : रैम क्या है ? रैम के प्रकार ?
सहायक मेमोरी – Secondary Memory:
सहायक मेमोरी उस मेमोरी को कहते है जो कम्प्यूटर सिस्टम मे अलग से जोड़ी जाती है , इस मेमोरी को Auxiliary Storage Device भी कहते है इस मेमोरी मे जो भी डेटा स्टोर किया जाता है वह permanently अर्थात स्थाई रूप से स्टोर हो जाता है जिसको भविष्य मे हम अपनी जरूरत के अनुसार उसका इस्तेमाल कर सकते है। इसमे स्टोर किया हुआ डेटा यूजर द्वारा डिलीट भी किया जा सकता है। और इसमें सुधार भी किया जा सकता है।
इस मेमोरी की डेटा Storage करने की क्षमता भी ज्यादा होती है तथा यह डेटा एक स्थान से दूसरे स्थान तक ट्रांसफर भी किया जा सकता है। हार्डडिस्क (Hard Disk), फ्लॉपी डिस्क, कॉम्पेक्ट डिस्क(CD), मेमोरी कार्ड, Pen Drive आदि Secondary Memory के ही example है।
Secondary Memory को दो भागो मे बाटा गया है:
- Fixed Memory
- Removable Memory
यह भी जाने : सहायक मेमोरी किसे कहते है ? सहायक मेमोरी के प्रकार ?
कैश मेमोरी – Cache Memory :
कैश मेमोरी हमारे कम्प्यूटर सिस्टम का महत्वपूर्ण भाग होती है यह हमारे कम्प्यूटर सिस्टम की प्रोसेसिंग स्पीड को बढ़ा देती है। यह सीपीयू को तेज़ गति के साथ डेटा उपलब्ध कराती है तथा CPU द्वारा प्रोसेस किये हुए डेटा को तेज़ गति से ग्रहण भी करती है जिसके कारण हमारे कंप्यूटर सिस्टम की कार्य करने की गति भी बढ़ जाती है|
यह मेमोरी साईज में बहुत छोटी होती है इसकी कार्य करने की गति मेन मेमोरी से भी ज्यादा तेज होती है, सीपीयू मे हम जिन – जिन प्रोग्राम को बार-बार खोलते है उन प्रोग्राम को यह मेमोरी अपने अंदर स्टोर करके रख लेती है, तथा सीपीयू कोई सा भी डेटा प्रोसेस करने से पहले कैश मेमोरी को चैक कर लेता है की वो डेटा वहा मौजूद है या नही |
कैश मेमोरी के प्रकार : –
- L1 cache
- L2 cache
- L3 cache
Chapter-10 : Mobile Apps in Hindi – मोबाइल एप्लिकेशन
Mobile Apps – मोबाइल एप्लिकेशन
मोबाइल एप्लिकेशन जिसको हम सामान्य तौर पर एक ऐप के रूप में जानते है, इसको हम एप्लिकेशन सॉफ़्टवेयर भी कहते है जिसको प्रत्येक मोबाइल डिवाइस मे चलाने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जैसे कि स्मार्टफोन अथवा टैबलेट कंप्यूटर आदि। मोबाइल एप्लिकेशन का प्रयोग अधिक से अधिक कार्य को पूरा करने के लिये किया जाता है।
प्रतियेक मोबाइल एप्लिकेशन को डाउनलोड करने के लिये कंपनी ने एक प्लेय store तैयार किया है जिसको हम Google Play Store तथा iOS के नाम से जानते है ये सभी एप्लिकेशन, मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम के द्वारा चलाये जाते है। इस प्लेटफॉर्म पर हमे सभी तरह कि एप्लिकेशन मिल जाते है जिनमें से कुछ एप्लिकेशन तो बिल्कुल फ्री होती है तथा जिनमें से कुछ एप्लिकेशन को खरीदना पड़ता है।
मोबाइल एप्लिकेशन – Mobile Apps के कुछ उदाहरण निम्न प्रकार से है।
Google Drive, Facebook, Twitter, Google Chrome, Gmail App, YouTube, Whatsapp
Types of apps – ऐप्स के प्रकार
मोबाइल ऐप्स को तीन भागो मे बाँटा गया है:-
- नेटिव एप्स – Native Apps
- वेब ऐप्स – Web Apps
- हाइब्रिड ऐप्स – Hybrid Apps
Native Apps – नेटिव एप्स
इस प्रकार के ऐप को एकल मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम के लिए तैयार किया जाता हैं। अर्थात यदि हम एंड्रॉइड मोबाइल इस्तेमाल करते है तो हम केवल एंड्रॉइड प्लेटफॉर्म पर ही उप्लब्ध ऐप का इस्तेमाल कर सकते है न कि किसी और प्लेटफॉर्म के ऐप जैसे कि आईओएस, सिम्बियन , विंडोज फोन आदि ।
Web Apps- वेब ऐप्स
वेब ऐप्स , लगभग नेटिव एप्स की तरह ही होते है इन ऐप्स को चलाने के लिए ब्राउज़र का प्रयोग किया जाता है ये ऐप्स Java Script, HTML एवम् CSS मे बनाये जाते है इन ऐप्स के द्वारा कोई भी यूजर direct एक URL पर redirect हो जाता हैं।
Hybrid Apps- हाइब्रिड ऐप्स
हाइब्रिड ऐप्स इस तरह ऐप्स है जिनको क्रॉस-प्लेटफ़ॉर्म मे इस्तेमाल करने के लिये डिज़ाइन किया गया है। हाइब्रिड ऐप्स को सभी तरह के प्लेटफार्मों पर इस्तेमाल कर सकते है। यह नेटिव ऐप्स की मुकाबले कम खर्चीला होता है।
Characteristics of Mobile App – मोबाईल एप्स की विशेषताएं
मोबाईल एप्स का विकास लगातार इतनी तेज़ी से हुआ कि कम्प्युटर सिस्टम से होने वाले सभी कार्य हम मोबाईल डिवाईस में आसानी से कर पाते है जिसके कारण मोबाईल एप युजर के बीच लोकप्रिय होता जा रहा हैं.
Easy Use – आसान उपयोग:
आज के समय में लगभग प्रत्येक व्यक्ति मोबाईल चलाना जानता है और ज्यादतर अपना कार्य मोबाईल पर ही करता है क्योकि मोबाईल एप्स को कम्प्युटर सॉफ्टवेयर की अपेक्षा चलाना बहुत ही आसान होता हैं. मोबाईल एप्स का युजर इंटरफेस यूजर फ्रेंडली होता है इनको विकसित करने के लिए ग्राफिकल युजर इंटरफेस का प्रयोग किया जाता हैं. मोबाईल एप्स को चलाने के लिये किसी कर्सर की आवश्यकता नहीं होती क्योकि सारे एप्स टचस्क्रीन मोबाईल के साथ कंपॅटिबल होते है
Voice Feature – वॉइस फीचर:
मोबाईल एप्स के अंतर्गत वॉइस फीचर एक ऐसी सुविधा है जिसका प्रयोग करके प्रत्येक व्यक्ति मोबाईल को वॉइस कमांड देकर सम्बंधित जानकारी प्राप्त कर सकता है , युजर को सम्बंधित जानकारी प्राप्त करने के लिये कुछ भी टाइप करने की आवश्यक्ता नहीं होती है
Small Size – छोटा आकार:
कम्प्युटर प्रोग्राम की अपेक्षा मोबाईल एप्स साईज में बहुत ही छोटे होते है यह मोबाईल में स्पेस भी कम घेरते है तथा स्मार्टफोन में कम मेमोरी होने पर भी इन एप्स को चलाने में कोई परेशानी नही होती हैं.
Easy Availability – आसान उपलब्धता:
एप स्टोर के माध्यम से हम आसानी से अपने मोबाईल के लिए कोई भी एप डाउनलोड कर सकते है, एप स्टोर के अंतर्गत लगभग सभी तरह एप उप्लब्ध रहते है जिनमें से कुछ एप तो बिल्कुल फ्री होते है तथा कुछ एप को हमे खरीदना पड़ता
Safe & Secure – ज्यादा सुरक्षित:
एप स्टोर के अंतर्गत सभी एप सुरक्षित एवं विश्वसनीय होते हैं क्योंकि एप स्टोर के निर्माता द्वारा सभी सुरक्षा प्रावधानों के बाद ही मोबाईल एप्स को एप स्टोर में लिस्टिंग किया जाता हैं.
Very Fast – ज्यादा तेज:
मोबाईल एप की कार्य क्षमता कम्प्यूटर की अपेक्षा ज्यादा तेज होती हैं जिससे युजर अपना कार्य तेज़ी से कर पाता है
Chapter-11 : Open source and Proprietary Software – ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर
Open source and Proprietary Software – ओपन सोर्स और प्रोप्राइटरी सॉफ्टवेयर
Open source and Proprietary Software – ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर एक ऐसा सॉफ्टवेयर है जिसको उपयोग करने के लिए हर एक व्यक्ति स्वतंत्र है अर्थात जब एक सॉफ्टवेयर developer किसी सॉफ्टवेयर को बनाता है तो उस सॉफ्टवेयर को बनाने के लिए वह एक source code लिखता है तथा उसके साथ – साथ publically सभी लोगो के लिए वह एक licence provide कराता है जिससे कि हर एक व्यक्ति उस सॉफ्टवेयर को पढ़ सके एवम जरुरत के अनुसार उसमें कुछ बद्लाव भी कर सके ।
ऐसे सॉफ्टवेयर को हम ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर कहते है । अगर आसान शब्दो में कहा जाये तो यह एक ऐसा सोर्स कोड होता है जिसको कि public देख भी सकती है और इसमें change भी कर सकती है तथा इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल बिल्कुल फ्री कर सकते है
ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर के उदाहरण
- Linux
- Ubuntu
- LibreOffice
- OpenOffice
- Mozilla Firefox
Features of Open Source Software – ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर की विशेषताएं
- इन सॉफ्टवेयर को स्वतंत्र रूप से चलाया जा सकता हैं।
- इसमें सोर्स कोड को सॉफ्टवेयर के साथ मिलाया जा सकता हैं|
- कोई भी प्रोग्रामर ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर के सोर्स कोड में सुधार भी कर सकता हैं।
- ये सॉफ्टवेयर इंटरनेट से फ्री में डाउनलोड किए जा सकते हैं।
Advantages of Open Source Software – ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर के फायदें
Free Software – निशुल्क सॉफ्टवेयर
सोर्स प्रोजेक्ट के अंतर्गत जो भी सॉफ्टवेयर बनाये जाते है, युजेर्स के लिये वह सभी निशुल्क उपलब्ध कराये जाते हैं
Ease Availability – आसानी से उपलब्धता
यह सॉफ्टवेयर आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं. युजर या डवलपर को ज्यादा औपचारिकताएं भी पूरी नहीं करनी पडती हैं.
High Quality – उच्च गुणवत्ता
ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर की गुणवत्ता कमर्शियल सॉफ्टवेयर के मुकाबले ज्यादा होती हैं. क्योंकि इन सॉफ्टवेयर को अलग अलग युजर द्वारा आवश्यकतानुसार उसमें बद्लाव किया जाता हैं तथा उसमें मौज़ूद छोटी-मोटी कमियो को भी समय रहते ठीक कर दिया जाता हैं. इसी कारण इन सॉफ्टवेयर की क्वालिटि बहुत ही अच्छी होती हैं.
Safe & Secure – ज्यादा सुरक्षित
ओपन सोर्स प्रोजेक्ट के अंतर्गत सभी सॉफ्टवेयर सुरक्षित भी रहते हैं. क्योकि इन सॉफ्टवेयर को अलग-अलग युजर के द्वारा समय समय पर उसमें मौज़ूद छोटी-मोटी कमियो को ठीक कर दिया जाता हैं.
What are Proprietary Software – प्रोपराइटरी सॉफ्टवेयर क्या हैं
प्रोपराइटरी सॉफ्टवेयर को बन्द स्रोत – ( Closed Software ) सॉफ्टवेयर के नाम से भी जाना जाता है, यह सॉफ्टवेयर कॉपीराइट सॉफ्टवेयर होते है जिसकी वजह से इनका इस्तेमाल सीमित रूप में होता है | प्रोपराइटरी सॉफ्टवेयर के सोर्स कोड को स्वतंत्र रूप से प्रयोग में नहीं लिया जा सकता है क्योकि इस सॉफ्टवेयर के जो भी डेवलपर अथवा मालिक है वह यूजर को स्वतंत्र रूप से इसका प्रयोग करने की अनुमति नहीं देते है , यूजर इसके सोर्स कोड को सीधे एक्सेस नहीं कर सकता हैं जिस कारण यूजर इस सॉफ्टवेयर में कोई भी सुधार नहीं कर सकता हैं
प्रोपराइटरी सॉफ्टवेयर के उदाहरण
- Microsoft Office 2019
- Microsoft Windows Operating System
- Adobe Flash MMX Player
- CorelDraw
- Adobe Photoshop
- Tally Prime
- Edius Pro
Difference between Open Source and Proprietary Software – ओपन सोर्स तथा प्रोपराइटरी सॉफ्टवेयर में अंतर
जिन सॉफ्टवेयर को उपयोग में लेने के लिये प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र है ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर कहलाते है इन सॉफ्टवेयर में उपयोगकर्ताओं अपनी आवश्यकतानुसार कुछ बद्लाव भी कर सकता है या इसमें कोई त्रुटि मिलने पर सुधार भी कर सकता है
इसके विपरीत कुछ ऐसे सॉफ्टवेयर जिनके अंतर्गत उनमें सुधार एवम् नियत्रण का अधिकार केवल उसी व्यक्ति, अथवा संगठन के हाथ में होता हैं जिन्होने इसको विकसित किया है प्रोपराइटरी सॉफ्टवेयर कहलाते है, प्रोपराइटरी सॉफ्टवेयर के मालिक ही कानूनी रूप से उस सॉफ़्टवेयर की डुप्लीकेट कॉपी बना सकते हैं , प्रोपराइटरी सॉफ्टवेयर का प्रयोग करने के लिये उपयोगकर्ता को यूज़र् एग्रीमेंट फोर्म को स्वीकार करना पड़ता है
ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर के लेखक इन सॉफ्टवेयर के सोर्स कोड को फ्री में दूसरों के लिये उपलब्ध कराते हैं ताकि प्रत्येक यूज़र् इन कोड को कॉपी कर सके तथा इसमें कुछ बद्लाव भी कर सके । ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर के कुछ उदाहरण जैसे कि Open Office, LibreOffice है ।

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